Friday, June 17, 2011
Wednesday, June 15, 2011
Friday, June 10, 2011
Saturday, June 4, 2011
क्या धर्म से दूर हो रही है दुनिया!
अपनी बर्बरता के लिए दुनिया भर में कुख्यात अमेरिकी सेना के अंदर इन दिनों चल रही एक अलग तरह की सरगर्मी की तरफ बहुत कम लोगों का ध्यान गया होगा। खबर के मुताबिक सेना के अंदर कार्यरत नास्तिकों के समूह को मान्यता दिलाने की कोशिशें इन दिनों अमेरिकी सेना के अंदर चर्चा का विषय है। विचारों से निरीश्वरवादी सार्जेट जस्टिन ग्रिफिथ, जो फोर्ट बै्रग स्थित अमेरिकी सेना के सबसे बड़े अड्डे पर तैनात हैं, इस मुहिम के सूत्रधार लोगों में हैं। दरअसल, इन लोगों ने सेना के अंदर एक समूह-मिलिटरी अथीइस्ट एंड सेक्युलर ह्यूमैनिस्ट यानी नास्तिक सैनिक और धर्मनिरपेक्ष मानवतावादी का निर्माण किया है। वे जानते हैं कि उनके समूह को मान्यता मिली तो वे न केवल सैनिक अड्डे पर अन्य आस्थावानों की तरह अपनी बैठकें कर सकते हैं, बल्कि अपनी बैठकों का प्रचार भी कर सकते हैं और समान विचार के लोगों को जोड़ सकते हैं। फिलहाल आधिकारिक स्वीकृति के अभाव में वह किसी के घर पर मिलकर चर्चा करते हैं। नास्तिकों के इस समूह में हाल ही में शामिल लेफ्टिनेंट सामंथा निकोल बताती हैं कि किस तरह ईसाई बहुल अमेरिकी सेना में नास्तिकों को अलग निगाह से एक अजूबे की तरह देखा जाता है। गौरतलब है फोर्ट ब्रैग की तरह बीस अन्य अमेरिकी सैनिक अड्डों पर भी ऐसे छोटे-बड़े समूह सक्रिय हैं जिन्हें सार्जेट ग्रिफिथ की कोशिशों के परवान चढ़ने का इंतजार है। अमेरिकी सेना के अंदर अपनी अलग पहचान स्थापित करने की नास्तिकों या सेक्युलर मानवतावादियों की जद्दोजहद की खबर की पृष्ठभूमि में यह जानना महत्वपूर्ण है कि खुद अमेरिका के अंदर इस संदर्भ में क्या स्थिति है? न्यूयार्क की सिटी यूनिवर्सिटी ने अमेरिकन रिलीजियस आइडेंटीफिकेशन सर्वेक्षण के जरिए अमेरिका में धर्म को न मानने वालों की संख्या के बारे में जानना चाहा था, जिसमें उनका विशेष जोर तीस साल से कम उम्र के अमेरिकियों की स्थिति को जानने पर था। जहां 24.5 प्रतिशत यानी 508.7 लाख लोग रोमन कैथोलिक धर्म को मानने वाले मिले। 16.3 प्रतिशत यानी 338.3 लाख लोग बैप्टिस्ट थे तो 14.1 फीसदी लोगों ने कहा कि वे धर्म को नहीं मानते हैं यानी नास्तिक हैं। इसके बाद 6.8 फीसदी यानी 141.9 लाख लोग ईसाई धर्म को (कोई संप्रदाय स्पष्ट नहीं किया) को मानने वाले थे तो 6.8 फीसदी यानी 141.9 लाख लोग मेथॉडिस्ट थे। इस पूरे मामले की गहराई में जाएं तो साफ दिखता है कि नास्तिकों की 35 फीसदी आबादी की उम्र 30 साल से कम की है। गौरतलब है कि अमेरिका के अनन्य सहयोगी ब्रिटेन में धर्म के प्रति लोगों का रुझान और तेजी से बदल रहा है। लंदन से प्रकाशित गार्डियन अखबार ने पिछले दिनों ब्रिटिश सोशल एटिट्यूड्स सर्वेक्षण के ताजा शोध को प्रकाशित किया था। मालूम हो कि इसके अंतर्गत हर साल यह पता किया जाता है कि ब्रिटेन में कितने लोग आस्तिक हैं। 1985 में जब पहली दफा यह सर्वेक्षण किया गया था तो 63 फीसदी लोगों ने कहा था कि वे क्रिश्चियन हैं, जबकि 34 फीसदी ने कहा था कि वे किसी भी धर्म में आस्था नहीं रखते। आज पूरी चौथाई सदी बाद प्राप्त सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि केवल 42 फीसदी ब्रिटेनवासियों ने कहा है कि उनकी धार्मिक आस्था है, जबकि 51 फीसदी ने कहा है कि उनका कोई धर्म नहीं है। बीता क्रिसमस ब्रिटेन के इतिहास का पहला अवसर था, जब उसकी बहुसंख्य आबादी ऐसी थी जो किसी भी धर्म में विश्र्वास नहीं रखती थी। ब्रिटेन के तीन प्रमुख राजनीतिक दलों में से दो का नेतृत्व नास्तिकों के हाथ में है और खुद प्रधानमंत्री भी स्वीकार करते हैं कि उनकी धार्मिक आस्था डांवाडोल रहती है। नार्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी का ताजा अध्ययन यह अनुमान लगाता है कि वह दिन दूर नहीं कि धर्म का नामोनिशान मिट जाएगा। विश्वविद्यालय स्थित अमेरिकन फिजिकल सोसाइटी ने नौ देशों के अध्ययन पर यह निष्कर्ष निकाला है। ये देश हैं आस्ट्रेलिया, कनाडा, चेक गणराज्य, फिनलैंड, आयरलैंड, नीदरलैंड्स, न्यूजीलैंड और स्विट्जरलैंड। नार्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी की उपरोक्त रिसर्च टीम ने इसे समझने के लिए एक गणितीय मॉडल का निर्माण किया ताकि विभिन्न धर्मावलंबियों और उसके पीछे अंतर्निहित सामाजिक प्रेरणाओं की पड़ताल की जा सके। वे जो उच्च गणित की जानकारी रखते हैं, समझ सकते हैं कि अलग-अलग कारकों से प्रभावित किसी व्यापक भौतिक घटना को समझने के लिए नान लीनियर डाइनामिक्स का प्रयोग होता है। इसी टीम के एक अन्य सदस्य डेनिअल अब्राहम्स ने वर्ष 2003 में इसी मॉडल का प्रयोग करके कम बोली जाने वाली भाषाओं के ह्रास या खात्मे का सांख्यिकीय आधार तलाशने की कोशिश की थी। उन्होंने दिखाया था कि कौन-सी भाषा टिकी रहेगी और कौन-सी भाषा विलुप्त होगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि संबंधित विशिष्ट भाषा बोलने की उपयोगिता कितनी है। उदाहरण के लिए अगर भाषा के संदर्भ में देखें तो पेरू की मृतप्राय केचुआन बोलने के बनिस्पत लोग स्पैनिश भाषा पसंद करेंगे और उसी तरह की स्थिति हम विशिष्ट धर्म के सदस्य होने या न होने के रूप में भी देख सकते हैं। रिसर्च टीम ने इसके लिए पिछले एक सौ साल के अंतराल का इन देशों की जनगणना का विवरण हासिल किया जिसमें धार्मिक प्रतिबद्धताओं का भी उल्लेख किया गया था। रिसर्च कारपोरेशन फॉर साइंस एडवांसमेंट के डॉक्टर रिचर्ड वीनर के मुताबिक बहुत से आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देशों में लोग खुद को धर्म से अलग करते जा रहे हैं। नीदरलैंड में जहां ऐसे लोगों की संख्या 40 फीसदी है तो चेक गणराज्य में 60 फीसदी लोगों ने किसी धर्म के प्रति प्रतिबद्धता नहीं दिखाई है। कोई यह पूछ सकता है कि पश्चिमी देशों की इन खबरों के बीच अपने देश की क्या स्थिति है? कुछ साल पहले एक अखबार ने देश के प्रमुख महानगरों में इसी तरह का सर्वेक्षण किया था, जिसमें उन्हें उत्तर एवं दक्षिण के बीच एक फर्क दिखाई दिया था। जहां सर्वेक्षण में शामिल उत्तर भारत के सहभागियों में से 92 फीसदी ने कहा था कि वे खुद पर यकीन करते हैं, वहीं दक्षिण के 86 फीसदी ने ईश्वर पर अपना यकीन जाहिर किया था। धर्म पर विश्वास रखने वाली आबादी की बड़ी संख्या के बावजूद दो बातें महत्वपूर्ण हैं जिसमें उत्तर के आठ फीसदी लोग एवं दक्षिण के 14 फीसदी लोगों ने ईश्वर पर अपना विश्वास व्यक्त नहीं किया। इसी तरह अन्य 43 फीसदी प्रतिभागियों ने धर्म को अपना निजी मामला मानने पर जोर दिया। अभी ज्यादा दिन नहीं बीता तमिलनाडु के तिरुचि में नास्तिकों का आठवां विश्वसम्मेलन हुआ था जिसमें विभिन्न देशों से लगभग 200 प्रतिनिधि पहुंचे थे। मालूम हो कि विजयवाड़ा स्थित अथीइस्ट सेंटर विगत लगभग चालीस सालों से ऐसे सम्मेलनों का आयोजन कर रहा है। प्रस्तुत सम्मेलन में यह तय किया गया कि मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती छद्म विज्ञान का बोलबाला है, जिसका मुकाबला करने में तर्कबुद्धि एवं नास्तिकता के प्रचार की आवश्यकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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