Sunday, January 23, 2011
सिंध के 135 हिंदू मौत के 40 साल बाद पाएंगे मुक्ति
उत्तर भारत के हिंदुओं की मान्यता है कि मृत्यु बाद अस्थियों को गंगा में प्रवाहित करने पर ही मुक्ति संभव है। यह लोक विश्वास गंगा-यमुना के दोआब से लेकर सुदूर सिंधु के तट पर (पाकिस्तान) रह रहे हिंदुओं तक में प्रचलित है। इसी आस्था के कारण ही वहां के हिंदू गंगा में अस्थि विसर्जन के लिए दशकों तक इंतजार करते हैं। गत 40 साल से गंगा में विसर्जन की बाट जोह रहे पाकिस्तान के सिंध प्रांत के ऐसे ही 135 हिंदुओं की अस्थियों को आखिरकार अब जाकर मुक्ति का वांछित मार्ग प्रशस्त हुआ है। पाकिस्तान सरकार ने इनके परिवारों को भारत में अस्थि विसर्जन के लिए वीजा दे दिया है। गत 40 सालों से पूर्वजों की अस्थियां सहेज कर रख रहे परिवार गत दिवस समझौता एक्सप्रेस से भारत आए। राम लाल के पिता का गंगा राम का 1970 में स्वर्गवास हुआ था। पिता की अस्थियां गंगा में प्रवाहित करने के लिए इतने सालों तक राम लाल ने मंदिर में सहेज कर रखी। अब पिता की अस्थियों के साथ राम लाल भारत आये हैं। गंगा में अस्थियां प्रवाहित करने के बाद वह यह मृत्यु के बाद होने वाले कर्मकांड करेंगे। राम लाल ने बताया कि पिता की मौत के समय वह 22 साल का था। आज वह 62 का हो गया है। इतने सालों बाद गंगा में पिता की अस्थियां प्रवाहित करने के बाद उसके दिल को सुकून मिलेगा। सिंध प्रांत में पंचमुखी श्री हनुमान मंदिर के पंडित महाराज रामनाथ ने बताया कि पाकिस्तान में काफी हिंदू परिवार हैं। किसी बुजुर्ग की मौत के बाद परिजनों की यही इच्छा रहती है कि अस्थियां गंगा में प्रवाहित की जाए, लेकिन वीजा नहीं मिल पाता। ऐसे में अस्थियां रखने को मंदिर के पास ही एक कमरा बनाया गया है। जहां अस्थियां रखते समय उनका नाम व पता, मृत्यु की तारीख लिख ली जाती है। गत 40 सालों से 135 अस्थियां थी। इन्हें दस बैगों में भर कर गंगा में विसर्जित करने के लिए 15 लोग भारत आए हैं। हरिद्वार में अस्थियां प्रवाहित करने के बाद गरुड़ पुराण का पाठ और भंडारा होगा।
Wednesday, January 19, 2011
काले पत्थर से प्रसन्न देवी
उत्तर प्रदेश के देवी मंदिर में पूजा-पाठ की अनोखी परंपरा है। यहां श्रद्धालु देवी पर काले पत्थर चढ़ाकर पूजा-अर्चना कर मन्नत मांगते हैं। इटावा शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर नगलाभीटन गांव स्थित भुजंगा देवी के मंदिर में सैकड़ों साल से यह प्रथा प्रचलित है
मंदिर के पुजारी बताते हैं कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से भुजंगा देवी की चौखट पर शीश झुकाकर, जल के साथ काला पत्थर चढ़ाते हैं, उनकी मनोकामना जरूर पूरी होती है। वहां के निवासियों के अनुसार लगभग 200 साल से यह प्रथा कायम है। इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक बार राजा कार्तिकेय को देवी मां ने सपना दिखाया कि नगलाभीटन के काले पहाड़ में उनकी मूर्ति मौजूद है। उसे वहां से निकलवाए और मंदिर का निर्माण कराए। साथ ही उन्होंने सपने में राजा से यह भी कहा कि जो भी भक्त पहाड़ के अंदर से निकलने वाले काले पत्थरों को उन पर अर्पित करेगा, उसकी हर मनोकामना पूरी होगी। राजा कार्तिकेय ने देवी के आदेशानुसार पहाड़ खुदवाया, तो उसमें से करीब छह फुट लंबी काले रंग की देवी की मूर्ति निकली, जिसका नामकरण भुजंगा देवी के रूप में हुआ। राजा ने वहीं देवी के भव्य मंदिर का निर्माण करवाकर सबसे पहले खुद ही काला पत्थर चढ़ाकर अपने लिए पुत्र-रत्न की कामना की। जल्द ही राजा की मनोकामना पूरी हो गई, तब से वहां श्रद्धालु काले पत्थर चढ़ाते आ रहे हैं। पुजारी बताते हैं कि पहले श्रद्धालु पहाड़ से पत्थर तोड़कर लाते थे, जिससे धीरे-धीरे उस पहाड़ का बड़ा हिस्सा टूट गया। पहाड़ समाप्त न हो इसके लिए अब श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए काले पत्थरों को मूर्ति से उतारकर मंदिर के बाहर बनवाए गए कुंड में रख दिया जाता है। जब अन्य श्रद्धालु आते हैं, तो वे कुंड से वही पत्थर लेकर मूर्ति पर अर्पित करते हैं। यह नियम तब से आज तक जारी है। वैसे तो हमेशा मंदिर में भक्तों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन नवरात्र के दिनों में यहां हजारों की संख्या में लोग भुजंगा देवी के दर्शन करते हैं औ र मन्नत मांगते हैं। नवरात्रि के दौरान मंदिर प्रांगण के पास बहुत बड़ा मेला भी लगता है।
मंदिर के पुजारी बताते हैं कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से भुजंगा देवी की चौखट पर शीश झुकाकर, जल के साथ काला पत्थर चढ़ाते हैं, उनकी मनोकामना जरूर पूरी होती है। वहां के निवासियों के अनुसार लगभग 200 साल से यह प्रथा कायम है। इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक बार राजा कार्तिकेय को देवी मां ने सपना दिखाया कि नगलाभीटन के काले पहाड़ में उनकी मूर्ति मौजूद है। उसे वहां से निकलवाए और मंदिर का निर्माण कराए। साथ ही उन्होंने सपने में राजा से यह भी कहा कि जो भी भक्त पहाड़ के अंदर से निकलने वाले काले पत्थरों को उन पर अर्पित करेगा, उसकी हर मनोकामना पूरी होगी। राजा कार्तिकेय ने देवी के आदेशानुसार पहाड़ खुदवाया, तो उसमें से करीब छह फुट लंबी काले रंग की देवी की मूर्ति निकली, जिसका नामकरण भुजंगा देवी के रूप में हुआ। राजा ने वहीं देवी के भव्य मंदिर का निर्माण करवाकर सबसे पहले खुद ही काला पत्थर चढ़ाकर अपने लिए पुत्र-रत्न की कामना की। जल्द ही राजा की मनोकामना पूरी हो गई, तब से वहां श्रद्धालु काले पत्थर चढ़ाते आ रहे हैं। पुजारी बताते हैं कि पहले श्रद्धालु पहाड़ से पत्थर तोड़कर लाते थे, जिससे धीरे-धीरे उस पहाड़ का बड़ा हिस्सा टूट गया। पहाड़ समाप्त न हो इसके लिए अब श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए काले पत्थरों को मूर्ति से उतारकर मंदिर के बाहर बनवाए गए कुंड में रख दिया जाता है। जब अन्य श्रद्धालु आते हैं, तो वे कुंड से वही पत्थर लेकर मूर्ति पर अर्पित करते हैं। यह नियम तब से आज तक जारी है। वैसे तो हमेशा मंदिर में भक्तों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन नवरात्र के दिनों में यहां हजारों की संख्या में लोग भुजंगा देवी के दर्शन करते हैं औ र मन्नत मांगते हैं। नवरात्रि के दौरान मंदिर प्रांगण के पास बहुत बड़ा मेला भी लगता है।
Saturday, January 15, 2011
सूर्य संस्कृति के उपासकों का पर्व
मकर संक्रान्ति
खगोलीय दृष्टि से सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में संक्रमण मकर संक्रान्ति कहलाता है। इसी दिन से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में भी प्रवेश करते हैं। भारतीय कालगणना के अनुसार प्रत्येक वर्ष में छह-छह महीनों के दो अयन होते हैं। सूर्य जब विषुवत रेखा के उत्तर मार्ग की ओर गतिशील रहता है तो उत्तरायण कहलाता है और दक्षिण मार्ग दक्षिणायन के नाम से प्रसिद्ध है। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा गया है। इस प्रकार मकर संक्रान्ति का पर्व रात्रि से प्रभातकाल की ओर तथा अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का पर्व है। इस दिन प्रभातकालीन सूर्य को साक्षी मानकर नदियों में स्नान करने का विशेष माहात्म्य है। मकर संक्रान्ति के दिन तीर्थराज प्रयाग और गंगा सागर आदि तीर्थ स्थानों में स्नान करने दूर-दूर से तीर्थयात्री आते हैं। इस अवसर पर स्नान, दान, जप, तप, श्राद्ध तथा तर्पण आदि धार्मिक अनुष्ठानों का भी विशेष महत्व है। भारत मूलत: सूयरेपासकों का देश होने के कारण यहां मकर संक्रान्ति का पर्व विशेष उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है।
उत्तराखण्ड के लोग इसे ‘उत्तरायणी’ या ‘घुघुती’ त्योहार के रूप में मनाते हैं। उत्तर प्रदेश में इसे ‘खिचड़ी’ त्योहार कहते हैं तथा इस दिन खिचड़ी का दान और सेवन अत्यन्त पुण्यकारी माना जाता है। हरियाणा और पंजाब में ‘लोहड़ी’ के नाम से प्रसिद्ध इस त्योहार के अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की गजक तथा रेवड़ी बांट कर खुशी मनाते हैं। राजस्थान में इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां तिल के लड्डू, घेवर आदि वस्तुओं पर रुपया रखकर अपनी सास को पण्राम करते हुए उनसे आशीर्वाद लेती है। उधर महाराष्ट्र के लोग एक-दूसरे को तिल-गुड़ देते हुए बोलते हैं - ‘तिल गुड़ लो और मीठा- मीठा बोलो।’ बंगाल में गंगा सागर पर विशाल मेला लगता है। तमिलनाडु में मकर संक्रान्ति का पर्व ‘पोंगल’ के रूप में मनाने की परम्परा है। असम में यह पर्व ‘माघिबहु’ अथवा ‘भोगाली-बिहु’ के नाम मनाया जाता है। वस्तुत: भारतराष्ट्र की अवधारणा सूर्य के संवत्सर चक्र से जुड़ी हुई एक वैज्ञानिक अवधारणा है। वैदिक साहित्य में प्रजावर्ग का भरण पोषण करने के कारण सूर्य को ‘भरत’ कहा गया है। सूर्य की भरत संज्ञा होने के कारण इस देश के सूयरेपासक लोगों का देश ‘भारतवषर्’ कहलाया इसलिए मकर संक्रान्ति हो या छठ पूजा, भारतवासियों के लिए राष्ट्रीय अस्मिता का पर्व है। सूर्य संक्रान्ति के इस पर्व के साथ धर्मिक तथा सामाजिक मान्यताओं के अतिरिक्त काल गणना, नक्षत्र विज्ञान, तथा वृष्टि विज्ञान के भी गूढ़ सिद्धान्त जुड़े हुए हैं। यह भारतवंशी सूयरेपासक आयरे का ही वैज्ञानिक आविष्कार है जिसके अनुसार मकर संक्रान्ति के दिन से ही आगामी साढ़े छह महीनों तक मेघ सूर्य के वाष्पीकरण की प्रक्रिया से ‘वृष्टिगर्भ’ को धारण करते हैं तथा वष्रा ऋतु में मानसूनी वष्रा इसी सफल ‘वृष्टिगर्भ’ का परिणाम है। कृषि प्रधान भारतवासियों के लिए वष्रा उनके जीविकोपार्जन का मुख्य आधार है और वैज्ञानिक दृष्टि से यह प्रक्रिया सूर्य के द्वारा जल में प्रवेश करने से सम्पन्न होती है। मकर राशि में सूर्य के प्रवेश होने का तात्पर्य है वाष्पीकरण की सतत प्रक्रिया द्वारा मानसूनों का निर्माण होना। जिसे भारतीय वैज्ञानिक ‘वृष्टिगर्भ’ कहते हैं। मकर संक्रान्ति की प्रभात वेला में भारत वर्ष का कृषक वर्ग इसी वृष्टिकारक सूर्य को पण्राम करता है तथा सुख-समृद्धि की कामना करता है।
खगोलीय दृष्टि से सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में संक्रमण मकर संक्रान्ति कहलाता है। इसी दिन से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में भी प्रवेश करते हैं। भारतीय कालगणना के अनुसार प्रत्येक वर्ष में छह-छह महीनों के दो अयन होते हैं। सूर्य जब विषुवत रेखा के उत्तर मार्ग की ओर गतिशील रहता है तो उत्तरायण कहलाता है और दक्षिण मार्ग दक्षिणायन के नाम से प्रसिद्ध है। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा गया है। इस प्रकार मकर संक्रान्ति का पर्व रात्रि से प्रभातकाल की ओर तथा अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का पर्व है। इस दिन प्रभातकालीन सूर्य को साक्षी मानकर नदियों में स्नान करने का विशेष माहात्म्य है। मकर संक्रान्ति के दिन तीर्थराज प्रयाग और गंगा सागर आदि तीर्थ स्थानों में स्नान करने दूर-दूर से तीर्थयात्री आते हैं। इस अवसर पर स्नान, दान, जप, तप, श्राद्ध तथा तर्पण आदि धार्मिक अनुष्ठानों का भी विशेष महत्व है। भारत मूलत: सूयरेपासकों का देश होने के कारण यहां मकर संक्रान्ति का पर्व विशेष उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है।
उत्तराखण्ड के लोग इसे ‘उत्तरायणी’ या ‘घुघुती’ त्योहार के रूप में मनाते हैं। उत्तर प्रदेश में इसे ‘खिचड़ी’ त्योहार कहते हैं तथा इस दिन खिचड़ी का दान और सेवन अत्यन्त पुण्यकारी माना जाता है। हरियाणा और पंजाब में ‘लोहड़ी’ के नाम से प्रसिद्ध इस त्योहार के अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की गजक तथा रेवड़ी बांट कर खुशी मनाते हैं। राजस्थान में इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां तिल के लड्डू, घेवर आदि वस्तुओं पर रुपया रखकर अपनी सास को पण्राम करते हुए उनसे आशीर्वाद लेती है। उधर महाराष्ट्र के लोग एक-दूसरे को तिल-गुड़ देते हुए बोलते हैं - ‘तिल गुड़ लो और मीठा- मीठा बोलो।’ बंगाल में गंगा सागर पर विशाल मेला लगता है। तमिलनाडु में मकर संक्रान्ति का पर्व ‘पोंगल’ के रूप में मनाने की परम्परा है। असम में यह पर्व ‘माघिबहु’ अथवा ‘भोगाली-बिहु’ के नाम मनाया जाता है। वस्तुत: भारतराष्ट्र की अवधारणा सूर्य के संवत्सर चक्र से जुड़ी हुई एक वैज्ञानिक अवधारणा है। वैदिक साहित्य में प्रजावर्ग का भरण पोषण करने के कारण सूर्य को ‘भरत’ कहा गया है। सूर्य की भरत संज्ञा होने के कारण इस देश के सूयरेपासक लोगों का देश ‘भारतवषर्’ कहलाया इसलिए मकर संक्रान्ति हो या छठ पूजा, भारतवासियों के लिए राष्ट्रीय अस्मिता का पर्व है। सूर्य संक्रान्ति के इस पर्व के साथ धर्मिक तथा सामाजिक मान्यताओं के अतिरिक्त काल गणना, नक्षत्र विज्ञान, तथा वृष्टि विज्ञान के भी गूढ़ सिद्धान्त जुड़े हुए हैं। यह भारतवंशी सूयरेपासक आयरे का ही वैज्ञानिक आविष्कार है जिसके अनुसार मकर संक्रान्ति के दिन से ही आगामी साढ़े छह महीनों तक मेघ सूर्य के वाष्पीकरण की प्रक्रिया से ‘वृष्टिगर्भ’ को धारण करते हैं तथा वष्रा ऋतु में मानसूनी वष्रा इसी सफल ‘वृष्टिगर्भ’ का परिणाम है। कृषि प्रधान भारतवासियों के लिए वष्रा उनके जीविकोपार्जन का मुख्य आधार है और वैज्ञानिक दृष्टि से यह प्रक्रिया सूर्य के द्वारा जल में प्रवेश करने से सम्पन्न होती है। मकर राशि में सूर्य के प्रवेश होने का तात्पर्य है वाष्पीकरण की सतत प्रक्रिया द्वारा मानसूनों का निर्माण होना। जिसे भारतीय वैज्ञानिक ‘वृष्टिगर्भ’ कहते हैं। मकर संक्रान्ति की प्रभात वेला में भारत वर्ष का कृषक वर्ग इसी वृष्टिकारक सूर्य को पण्राम करता है तथा सुख-समृद्धि की कामना करता है।
Friday, January 14, 2011
Thursday, January 13, 2011
आस्था और जनहित का द्वंद्व
अवैध प्रार्थनास्थलों का मसला अब एक राष्ट्रीय चिंता का प्रश्न बनता जा रहा है। यह अकारण नहीं कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में हस्तक्षेप कर सभी राज्यों को यह गिनती कर बताने को कहा कि उनके यहां कितने अवैध धार्मिक स्थल हैं? पिछले दिनों उड़ीसा हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय की इस मुहिम को आगे बढ़ाते हुए कटक के जिला प्रशासन को आदेश दिया कि कटक की सरकारी जमीन पर या सड़कों को घेर रहे अवैध तरीके से बनाए गए प्रार्थनास्थलों को वह आगे के दो माह में गिरा दे। कटक शहर की समस्याओं पर दायर एक जनहित याचिका का निपटारा करते हुए बीपी दास और एमएम दास की द्विसदस्यीय पीठ ने यह आदेश दिया। प्रस्तुत आदेश देने के पहले उसने जिला प्रशासन को यह आदेश दिया था कि शहर की सामान्य यातायात को प्रभावित करने वाले सभी किस्म के प्रार्थनास्थलों की सूची वह तैयार करे। कटक नगर निगम और राज्य सिंचाई विभाग ने एक साझे सर्वेक्षण में ऐसे 111 प्रार्थनास्थलों को चिह्नित किया था, जो सड़कों को घेर कर बनाए गए हैं और जिसकी वजह से त्यौहारों, उत्सवों के वक्त जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है। अब देखना है कि सरकार इस मामले में आगे कैसे बढ़ती है? सवाल है कि आस्था जैसे संवेदनशील मसले पर क्या सब कुछ आसानी से निपट पाएगा? इस पृष्ठभूमि में उन हस्तक्षेपों के बारे में जानना समीचीन होगा जो इस बात को रेखांकित करते हैं कि अगर सही ढंग से समझाया जाए तो आम लोग आस्था के प्रश्न को जनहित के मातहत करने को तैयार हो जाते हैं। क्या इस बात पर आसानी से यकीन किया जा सकता है कि मध्य भारत में स्थित एक चर्चित शहर में जहां मुल्क के किसी भी अन्य शहर की तरह विभिन्न धर्मो के अनुयायी रहते हैं, वहां डेढ़ साल के अंतराल में 168 धार्मिक स्थल स्थापित किए गए। क्या यह आज के वातावरण में किसी को आसानी से पच सकती है कि शहर के यातायात एवं सामाजिक जीवन को तनावमुक्त बनाए रखने के लिए सभी आस्थाओं से संबंधित लोगों ने इसके लिए मिल-जुलकर काम किया और एक तरह से लोगों के सामने सांप्रदायिक सद्भाव की नई मिसाल पेश की। जानने योग्य है कि भेड़ाघाट और नर्मदा नदी की मौजूदगी से पहले चर्चित जबलपुर शहर के सभी वर्गो एवं धर्मो के लोगों द्वारा उठाया गया यह कदम पूरे मुल्क में चर्चा का विषय बना। यातायात के बढ़ते दबाव को अधिक गंभीर बनाने वाले सड़कों के बीचोबीच स्थित इन धार्मिक स्थलों को प्रतिस्थापित करने वाले इस अभियान की शुरुआत शहर के पॉश इलाके सिविल लाइन में स्थित एक मजार को स्थानांतरित करके हुई। इसके बाद शुरू हुए सिलसिले में बड़ी संख्या में मजारों, मस्जिदों, चर्च, कब्रिस्तानों, गुरुद्वारों, मंदिरों को अपने स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर स्थापित किया गया। इस मामले में न्यायपालिका का भी बेहद सकारात्मक रुख रहा और जिला प्रशासन ने भी इस काम को अंजाम देने के पहले समाज के विभिन्न तबकों को विश्र्वास में लिया और उनसे सुझाव एवं सहयोग लेकर ही काम को आगे बढ़ाया। इन्हें हटाने के पूर्व पुजारी, मौलवी आदि के द्वारा श्रद्धालुओं की उपस्थिति में ही मूर्तियों एवं मजारों को स्थानांतरित किया गया। कई मूर्तियों को नर्मदा में विसर्जित भी किया गया। इससे साफ है कि इस बेहद संवेदनशील योजना की सफलता पर पहले से ही कई लोगों को संदेह था, लेकिन आज जब सड़कें चौड़ी हो गई हैं तो यातायात की समस्या से निपटने की उम्मीद जगी है। यह बात अब लोगों की समझ में आ गई है। गौरतलब है कि शहर जबलपुर की इस नायाब पहल के पहले मंदिरों का शहर कहे जाने वाले दक्षिण के मदुरई ने भी कुछ समय पहले अपने यहां इसी तरह की कार्रवाई की थी। प्राचीन तमिल साहित्य में भी विशेष स्थान प्राप्त मदुरई में कुछ समय पहले शहर की नगर पालिका की अगुआई में अनधिकृत ढंग से बनाए गए 250 से अधिक मंदिर, दो चर्च एवं एक दरगाह को हटाया गया, जिनकी मौजूदगी के चलते आम नागरिकों को बेहद असुविधा का सामना करना पड़ रहा था। इस बात को रेखांकित करना जरूरी है कि इन अवैध धार्मिक स्थलों को हटाने की यह कार्रवाई नगरपालिका द्वारा शहर में बनाए गए अवैध निर्माणों को हटाने के तहत ही की गई थी। इसके तहत समूचे शहर में लगभग छह सौ ऐसे निर्माण गिराए गए थे। दरअसल, नगरपालिका का यह कदम उच्च अदालत के आदेश के तहत सामने आया, जिसमें संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि यातायात में बाधक बने ऐसे अवैध निर्माणों को हटाया जाए। निश्चित ही अदालती आदेश कोई ऐसा परवाना नहीं था कि शहर के बाशिंदे उसको आसानी से अमल होने देते। यहां पर भी प्रशासन के लिए यह काम आसान नहीं था। कई स्थानों पर ऐसे तत्वों ने जो इन अवैध धार्मिक स्थलों से अच्छी-खासी कमाई कर लेते थे लोगों को लामबंद करने की कोशिश भी की, लेकिन यहां पर भी प्रशासन की सूझबूझ एवं विवेक की जीत हुई। साफ है कि जबलपुर की ही तरह मदुरई में सार्वजनिक व्यवस्था एवं आस्था के बीच उभरे द्वंद्व को जिस समझदारी से हल किया गया, वह खबर कहीं दूर नहीं जा सकी। परंतु यह बात किसी सदमे से कम नहीं है कि मुल्क की औद्योगिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई में प्रशासन को जब इसी तरह की कार्रवाई करनी पड़ी तो यह समाचार भी कहीं दूर नहीं जा सका। देश के लोग नहीं जान सके कि आम नागरिकों के संगठित हस्तक्षेप के चलते एक हजार से अधिक अवैध प्रार्थनास्थलों को वहां से प्रशासन ने हटा दिया। दरअसल यह सिलसिला शुरू हुआ एक सामाजिक कार्यकर्ता श्री भगवान रैयानी द्वारा वर्ष 2002 में दायर जनहित याचिका के बाद। समूचे शहर में अवैध प्रार्थनास्थलों की लगातार बढ़ती जा रही तादाद से आम जनता को विभिन्न किस्म की असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा था, जिसे देखते हुए ही यह याचिका दायर की गई थी। इस पर मुंबई हाईकोर्ट ने मामले में अपना फैसला सुनाते हुए वृहत मुंबई नगर निगम के आला अधिकारियों को निर्देश दिया कि वह शहर भर में फैले अवैध मंदिरों, मस्जिदों, चर्चो या अन्य धार्मिक स्थलों को हटा दें और इस बारे में की गई कार्रवाई की रिपोर्ट भी अदालत के सामने पेश करें। निश्चित ही ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मुंबई अब अवैध धार्मिक स्थलों या ऐसे धार्मिक स्थलों से, जिनकी मौजूदगी शहर के सुचारू ढंग से चलने को बाधित कर रही है, से मुक्त हो गई है। परंतु 1992-93 में जिस शहर में हजार से अधिक मासूम लोग सांप्रदायिक दंगों का शिकार हुए थे, सामाजिक सद्भाव के लिए लोगों के सहयोग से ही इस तरह के अनावश्यक धार्मिक स्थलों को हटना एक अच्छी शुरुआत कही जा सकती है। ऐसे प्रार्थनास्थल जो न केवल जनता की आस्था का दोहन करते दिखते हैं, बल्कि हमारे बहुधर्मीय मुल्क में सामाजिक ताने-बाने को और अधिक नाजुक बनाने की संभावना रखते हैं। 21वीं सदी में क्या हमें इस बारे में नहीं सोचना चाहिए कि सार्वजनिक आवागमन के इलाके धार्मिक आयोजनों की स्थायी संरचनाओं में तब्दील न होने पाएं और ऐसे धार्मिक जगहों पर विशेष मौकों पर जुटने वाली भीड़ शहर की सड़कों को बाधित न कर सके। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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