उत्तर भारत के हिंदुओं की मान्यता है कि मृत्यु बाद अस्थियों को गंगा में प्रवाहित करने पर ही मुक्ति संभव है। यह लोक विश्वास गंगा-यमुना के दोआब से लेकर सुदूर सिंधु के तट पर (पाकिस्तान) रह रहे हिंदुओं तक में प्रचलित है। इसी आस्था के कारण ही वहां के हिंदू गंगा में अस्थि विसर्जन के लिए दशकों तक इंतजार करते हैं। गत 40 साल से गंगा में विसर्जन की बाट जोह रहे पाकिस्तान के सिंध प्रांत के ऐसे ही 135 हिंदुओं की अस्थियों को आखिरकार अब जाकर मुक्ति का वांछित मार्ग प्रशस्त हुआ है। पाकिस्तान सरकार ने इनके परिवारों को भारत में अस्थि विसर्जन के लिए वीजा दे दिया है। गत 40 सालों से पूर्वजों की अस्थियां सहेज कर रख रहे परिवार गत दिवस समझौता एक्सप्रेस से भारत आए। राम लाल के पिता का गंगा राम का 1970 में स्वर्गवास हुआ था। पिता की अस्थियां गंगा में प्रवाहित करने के लिए इतने सालों तक राम लाल ने मंदिर में सहेज कर रखी। अब पिता की अस्थियों के साथ राम लाल भारत आये हैं। गंगा में अस्थियां प्रवाहित करने के बाद वह यह मृत्यु के बाद होने वाले कर्मकांड करेंगे। राम लाल ने बताया कि पिता की मौत के समय वह 22 साल का था। आज वह 62 का हो गया है। इतने सालों बाद गंगा में पिता की अस्थियां प्रवाहित करने के बाद उसके दिल को सुकून मिलेगा। सिंध प्रांत में पंचमुखी श्री हनुमान मंदिर के पंडित महाराज रामनाथ ने बताया कि पाकिस्तान में काफी हिंदू परिवार हैं। किसी बुजुर्ग की मौत के बाद परिजनों की यही इच्छा रहती है कि अस्थियां गंगा में प्रवाहित की जाए, लेकिन वीजा नहीं मिल पाता। ऐसे में अस्थियां रखने को मंदिर के पास ही एक कमरा बनाया गया है। जहां अस्थियां रखते समय उनका नाम व पता, मृत्यु की तारीख लिख ली जाती है। गत 40 सालों से 135 अस्थियां थी। इन्हें दस बैगों में भर कर गंगा में विसर्जित करने के लिए 15 लोग भारत आए हैं। हरिद्वार में अस्थियां प्रवाहित करने के बाद गरुड़ पुराण का पाठ और भंडारा होगा।
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