मकर संक्रान्ति
खगोलीय दृष्टि से सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में संक्रमण मकर संक्रान्ति कहलाता है। इसी दिन से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में भी प्रवेश करते हैं। भारतीय कालगणना के अनुसार प्रत्येक वर्ष में छह-छह महीनों के दो अयन होते हैं। सूर्य जब विषुवत रेखा के उत्तर मार्ग की ओर गतिशील रहता है तो उत्तरायण कहलाता है और दक्षिण मार्ग दक्षिणायन के नाम से प्रसिद्ध है। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा गया है। इस प्रकार मकर संक्रान्ति का पर्व रात्रि से प्रभातकाल की ओर तथा अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का पर्व है। इस दिन प्रभातकालीन सूर्य को साक्षी मानकर नदियों में स्नान करने का विशेष माहात्म्य है। मकर संक्रान्ति के दिन तीर्थराज प्रयाग और गंगा सागर आदि तीर्थ स्थानों में स्नान करने दूर-दूर से तीर्थयात्री आते हैं। इस अवसर पर स्नान, दान, जप, तप, श्राद्ध तथा तर्पण आदि धार्मिक अनुष्ठानों का भी विशेष महत्व है। भारत मूलत: सूयरेपासकों का देश होने के कारण यहां मकर संक्रान्ति का पर्व विशेष उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है।
उत्तराखण्ड के लोग इसे ‘उत्तरायणी’ या ‘घुघुती’ त्योहार के रूप में मनाते हैं। उत्तर प्रदेश में इसे ‘खिचड़ी’ त्योहार कहते हैं तथा इस दिन खिचड़ी का दान और सेवन अत्यन्त पुण्यकारी माना जाता है। हरियाणा और पंजाब में ‘लोहड़ी’ के नाम से प्रसिद्ध इस त्योहार के अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की गजक तथा रेवड़ी बांट कर खुशी मनाते हैं। राजस्थान में इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां तिल के लड्डू, घेवर आदि वस्तुओं पर रुपया रखकर अपनी सास को पण्राम करते हुए उनसे आशीर्वाद लेती है। उधर महाराष्ट्र के लोग एक-दूसरे को तिल-गुड़ देते हुए बोलते हैं - ‘तिल गुड़ लो और मीठा- मीठा बोलो।’ बंगाल में गंगा सागर पर विशाल मेला लगता है। तमिलनाडु में मकर संक्रान्ति का पर्व ‘पोंगल’ के रूप में मनाने की परम्परा है। असम में यह पर्व ‘माघिबहु’ अथवा ‘भोगाली-बिहु’ के नाम मनाया जाता है। वस्तुत: भारतराष्ट्र की अवधारणा सूर्य के संवत्सर चक्र से जुड़ी हुई एक वैज्ञानिक अवधारणा है। वैदिक साहित्य में प्रजावर्ग का भरण पोषण करने के कारण सूर्य को ‘भरत’ कहा गया है। सूर्य की भरत संज्ञा होने के कारण इस देश के सूयरेपासक लोगों का देश ‘भारतवषर्’ कहलाया इसलिए मकर संक्रान्ति हो या छठ पूजा, भारतवासियों के लिए राष्ट्रीय अस्मिता का पर्व है। सूर्य संक्रान्ति के इस पर्व के साथ धर्मिक तथा सामाजिक मान्यताओं के अतिरिक्त काल गणना, नक्षत्र विज्ञान, तथा वृष्टि विज्ञान के भी गूढ़ सिद्धान्त जुड़े हुए हैं। यह भारतवंशी सूयरेपासक आयरे का ही वैज्ञानिक आविष्कार है जिसके अनुसार मकर संक्रान्ति के दिन से ही आगामी साढ़े छह महीनों तक मेघ सूर्य के वाष्पीकरण की प्रक्रिया से ‘वृष्टिगर्भ’ को धारण करते हैं तथा वष्रा ऋतु में मानसूनी वष्रा इसी सफल ‘वृष्टिगर्भ’ का परिणाम है। कृषि प्रधान भारतवासियों के लिए वष्रा उनके जीविकोपार्जन का मुख्य आधार है और वैज्ञानिक दृष्टि से यह प्रक्रिया सूर्य के द्वारा जल में प्रवेश करने से सम्पन्न होती है। मकर राशि में सूर्य के प्रवेश होने का तात्पर्य है वाष्पीकरण की सतत प्रक्रिया द्वारा मानसूनों का निर्माण होना। जिसे भारतीय वैज्ञानिक ‘वृष्टिगर्भ’ कहते हैं। मकर संक्रान्ति की प्रभात वेला में भारत वर्ष का कृषक वर्ग इसी वृष्टिकारक सूर्य को पण्राम करता है तथा सुख-समृद्धि की कामना करता है।
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