Thursday, January 13, 2011

आस्था और जनहित का द्वंद्व

अवैध प्रार्थनास्थलों का मसला अब एक राष्ट्रीय चिंता का प्रश्न बनता जा रहा है। यह अकारण नहीं कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में हस्तक्षेप कर सभी राज्यों को यह गिनती कर बताने को कहा कि उनके यहां कितने अवैध धार्मिक स्थल हैं? पिछले दिनों उड़ीसा हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय की इस मुहिम को आगे बढ़ाते हुए कटक के जिला प्रशासन को आदेश दिया कि कटक की सरकारी जमीन पर या सड़कों को घेर रहे अवैध तरीके से बनाए गए प्रार्थनास्थलों को वह आगे के दो माह में गिरा दे। कटक शहर की समस्याओं पर दायर एक जनहित याचिका का निपटारा करते हुए बीपी दास और एमएम दास की द्विसदस्यीय पीठ ने यह आदेश दिया। प्रस्तुत आदेश देने के पहले उसने जिला प्रशासन को यह आदेश दिया था कि शहर की सामान्य यातायात को प्रभावित करने वाले सभी किस्म के प्रार्थनास्थलों की सूची वह तैयार करे। कटक नगर निगम और राज्य सिंचाई विभाग ने एक साझे सर्वेक्षण में ऐसे 111 प्रार्थनास्थलों को चिह्नित किया था, जो सड़कों को घेर कर बनाए गए हैं और जिसकी वजह से त्यौहारों, उत्सवों के वक्त जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है। अब देखना है कि सरकार इस मामले में आगे कैसे बढ़ती है? सवाल है कि आस्था जैसे संवेदनशील मसले पर क्या सब कुछ आसानी से निपट पाएगा? इस पृष्ठभूमि में उन हस्तक्षेपों के बारे में जानना समीचीन होगा जो इस बात को रेखांकित करते हैं कि अगर सही ढंग से समझाया जाए तो आम लोग आस्था के प्रश्न को जनहित के मातहत करने को तैयार हो जाते हैं। क्या इस बात पर आसानी से यकीन किया जा सकता है कि मध्य भारत में स्थित एक चर्चित शहर में जहां मुल्क के किसी भी अन्य शहर की तरह विभिन्न धर्मो के अनुयायी रहते हैं, वहां डेढ़ साल के अंतराल में 168 धार्मिक स्थल स्थापित किए गए। क्या यह आज के वातावरण में किसी को आसानी से पच सकती है कि शहर के यातायात एवं सामाजिक जीवन को तनावमुक्त बनाए रखने के लिए सभी आस्थाओं से संबंधित लोगों ने इसके लिए मिल-जुलकर काम किया और एक तरह से लोगों के सामने सांप्रदायिक सद्भाव की नई मिसाल पेश की। जानने योग्य है कि भेड़ाघाट और नर्मदा नदी की मौजूदगी से पहले चर्चित जबलपुर शहर के सभी वर्गो एवं धर्मो के लोगों द्वारा उठाया गया यह कदम पूरे मुल्क में चर्चा का विषय बना। यातायात के बढ़ते दबाव को अधिक गंभीर बनाने वाले सड़कों के बीचोबीच स्थित इन धार्मिक स्थलों को प्रतिस्थापित करने वाले इस अभियान की शुरुआत शहर के पॉश इलाके सिविल लाइन में स्थित एक मजार को स्थानांतरित करके हुई। इसके बाद शुरू हुए सिलसिले में बड़ी संख्या में मजारों, मस्जिदों, चर्च, कब्रिस्तानों, गुरुद्वारों, मंदिरों को अपने स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर स्थापित किया गया। इस मामले में न्यायपालिका का भी बेहद सकारात्मक रुख रहा और जिला प्रशासन ने भी इस काम को अंजाम देने के पहले समाज के विभिन्न तबकों को विश्र्वास में लिया और उनसे सुझाव एवं सहयोग लेकर ही काम को आगे बढ़ाया। इन्हें हटाने के पूर्व पुजारी, मौलवी आदि के द्वारा श्रद्धालुओं की उपस्थिति में ही मूर्तियों एवं मजारों को स्थानांतरित किया गया। कई मूर्तियों को नर्मदा में विसर्जित भी किया गया। इससे साफ है कि इस बेहद संवेदनशील योजना की सफलता पर पहले से ही कई लोगों को संदेह था, लेकिन आज जब सड़कें चौड़ी हो गई हैं तो यातायात की समस्या से निपटने की उम्मीद जगी है। यह बात अब लोगों की समझ में आ गई है। गौरतलब है कि शहर जबलपुर की इस नायाब पहल के पहले मंदिरों का शहर कहे जाने वाले दक्षिण के मदुरई ने भी कुछ समय पहले अपने यहां इसी तरह की कार्रवाई की थी। प्राचीन तमिल साहित्य में भी विशेष स्थान प्राप्त मदुरई में कुछ समय पहले शहर की नगर पालिका की अगुआई में अनधिकृत ढंग से बनाए गए 250 से अधिक मंदिर, दो चर्च एवं एक दरगाह को हटाया गया, जिनकी मौजूदगी के चलते आम नागरिकों को बेहद असुविधा का सामना करना पड़ रहा था। इस बात को रेखांकित करना जरूरी है कि इन अवैध धार्मिक स्थलों को हटाने की यह कार्रवाई नगरपालिका द्वारा शहर में बनाए गए अवैध निर्माणों को हटाने के तहत ही की गई थी। इसके तहत समूचे शहर में लगभग छह सौ ऐसे निर्माण गिराए गए थे। दरअसल, नगरपालिका का यह कदम उच्च अदालत के आदेश के तहत सामने आया, जिसमें संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि यातायात में बाधक बने ऐसे अवैध निर्माणों को हटाया जाए। निश्चित ही अदालती आदेश कोई ऐसा परवाना नहीं था कि शहर के बाशिंदे उसको आसानी से अमल होने देते। यहां पर भी प्रशासन के लिए यह काम आसान नहीं था। कई स्थानों पर ऐसे तत्वों ने जो इन अवैध धार्मिक स्थलों से अच्छी-खासी कमाई कर लेते थे लोगों को लामबंद करने की कोशिश भी की, लेकिन यहां पर भी प्रशासन की सूझबूझ एवं विवेक की जीत हुई। साफ है कि जबलपुर की ही तरह मदुरई में सार्वजनिक व्यवस्था एवं आस्था के बीच उभरे द्वंद्व को जिस समझदारी से हल किया गया, वह खबर कहीं दूर नहीं जा सकी। परंतु यह बात किसी सदमे से कम नहीं है कि मुल्क की औद्योगिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई में प्रशासन को जब इसी तरह की कार्रवाई करनी पड़ी तो यह समाचार भी कहीं दूर नहीं जा सका। देश के लोग नहीं जान सके कि आम नागरिकों के संगठित हस्तक्षेप के चलते एक हजार से अधिक अवैध प्रार्थनास्थलों को वहां से प्रशासन ने हटा दिया। दरअसल यह सिलसिला शुरू हुआ एक सामाजिक कार्यकर्ता श्री भगवान रैयानी द्वारा वर्ष 2002 में दायर जनहित याचिका के बाद। समूचे शहर में अवैध प्रार्थनास्थलों की लगातार बढ़ती जा रही तादाद से आम जनता को विभिन्न किस्म की असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा था, जिसे देखते हुए ही यह याचिका दायर की गई थी। इस पर मुंबई हाईकोर्ट ने मामले में अपना फैसला सुनाते हुए वृहत मुंबई नगर निगम के आला अधिकारियों को निर्देश दिया कि वह शहर भर में फैले अवैध मंदिरों, मस्जिदों, चर्चो या अन्य धार्मिक स्थलों को हटा दें और इस बारे में की गई कार्रवाई की रिपोर्ट भी अदालत के सामने पेश करें। निश्चित ही ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मुंबई अब अवैध धार्मिक स्थलों या ऐसे धार्मिक स्थलों से, जिनकी मौजूदगी शहर के सुचारू ढंग से चलने को बाधित कर रही है, से मुक्त हो गई है। परंतु 1992-93 में जिस शहर में हजार से अधिक मासूम लोग सांप्रदायिक दंगों का शिकार हुए थे, सामाजिक सद्भाव के लिए लोगों के सहयोग से ही इस तरह के अनावश्यक धार्मिक स्थलों को हटना एक अच्छी शुरुआत कही जा सकती है। ऐसे प्रार्थनास्थल जो न केवल जनता की आस्था का दोहन करते दिखते हैं, बल्कि हमारे बहुधर्मीय मुल्क में सामाजिक ताने-बाने को और अधिक नाजुक बनाने की संभावना रखते हैं। 21वीं सदी में क्या हमें इस बारे में नहीं सोचना चाहिए कि सार्वजनिक आवागमन के इलाके धार्मिक आयोजनों की स्थायी संरचनाओं में तब्दील न होने पाएं और ऐसे धार्मिक जगहों पर विशेष मौकों पर जुटने वाली भीड़ शहर की सड़कों को बाधित न कर सके। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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