Wednesday, December 29, 2010
प्रार्थना का स्तर
लोग कहतें हैं, ‘हृदय से प्रार्थना करो।’ इससे काम नहीं चलने वाला जब आप बैचेनी में हों, इच्छा से भरे हों और बिखरे हुए हों। आपको अपने अस्तित्व से प्रार्थना करनी होगी, दूसरे चक्र से। जब पूर्ण कृतज्ञ हों, तब आप हृदय से प्रार्थना करो, लेकिन जब आप दयनीयता की स्थिति में हों तब आप हृदय से प्रार्थना नहीं कर सकते। एक बार जब आप यह कहते हो, ‘ठीक है, मैंने सब कुछ छोड़ दिया,’ तब आपकी प्रार्थना की तीव्रता पूर्ण हो जाती है। इसी तरह से इच्छा के ज्वर से बाहर निकला जा सकता है। अपने अस्तित्व से प्रार्थना करें। यही आपको सशक्त बनाती है, क्योंकि दिव्यता (परमात्मा) कमजोर के लिए बनी है। इसीलिए उसे ‘दीनबंधु’ कहतें है। दीन का अर्थ है कमजोर, दयनीय, शक्तिहीन और निस्सहाय और बंधु का अर्थ है मित्र। इसीलिए आप प्रार्थना करतें है, ‘अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं है और मैं तनाव छोड़ देता हूं। मुझे सहायता की आवश्यकता है।’ तभी आपके चारों ओर परिर्वतन होने लगतें हैं। प्राय: लोग पूछते हैं, ‘हम इतने सारे देवी-देवताओं से प्रार्थना क्यों करतें हैं?’ दिव्यता (परमात्मा) एक ही है, लेकिन इसे अनेक नामों से पुकारा जाता है। बस यही कारण है कि यही परमात्मा को भिन्न-भिन्न नामों, रूप और रंगों से जगाया जाता है। ईश्वर सबके हृदय में है, सब जगह है, आपके चारों ओर है और आपमें भी है। वह जानता है कि आपके लिए सबसे उत्तम क्या है और जो सबसे अच्छा है वही आपको देता है। प्रार्थना का अर्थ है दिल की गहराइयों से पुकारना। एक बच्चा रोता है तो कैसे रोता है? बच्चा अपनी मां के लिए पूरे शरीर से रोता है। उसके शरीर का एक-एक कण और दिल का एक-एक कोना कुछ मांगता है। इस तरह पुकारना। पूरे दिल से पुकारना ही प्रार्थना है। जब हम अपने हृदय से कुछ करते हैं तो यही प्रार्थना होती है। प्रार्थना की उच्च अवस्था ही ध्यान है। प्रार्थना का अर्थ है मांगना, ध्यान का अर्थ है सुनना। प्रार्थना में आप कहतें है, ‘मुझे ये दो, वो दो।’ निर्देश देते हो, मांग करते हो। ध्यान में आप कहतें है, ‘मैं यहां पर हूं सुनने के लिए, जो कुछ भी आप बताना चाहते हैं मुझे बताएं।’ जब प्रार्थना अपने शिखर की ओर जाती है तब वह ध्यान हो जाता है। मौन प्रार्थना से बेहतर है। प्राय: प्रार्थना किसी भाषा में होती है-र्जमन, हिंदी, स्पेनिश, इंग्लिश। वास्तव में, इन सबका एक ही अर्थ है। लेकिन मौन इससे एक कदम आगे है। यह एक कदम भाषा की सीमा से परे है जिसे पूरा ब्रह्मांड समझता है। प्रकृति इसी से प्र्रदशित होती है। प्रार्थना शब्द शक्ति है जो आपको हृदय के मौन की ओर ले जाती है। शब्द का उद्देश्य मौन का सृजन करना है। र्कम का उद्देश्य है गहन विश्राम प्राप्त करना। गहन विश्राम का उद्देश्य है आपको पूर्ण करना। पूर्णता में ही आपको प्रसन्नता, आनंद की प्राप्ति होती है। प्रेम का उद्देश्य है आनंद को अपने भीतर जन्म लेने देना।
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