आने वाले दिनों में धर्म का नामो-निशान मिट जाने की खबर निश्चित ही विस्मित करने वाली लग सकती है। अमेरिकन फिजिकल सोसायटी ने नौ देशों के अध्ययन पर यह निष्कर्ष निकाला है। ये देश हैं आस्ट्रेलिया, कनाडा, चेक गणराज्य, फिनलैंड, आयरलैंड, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड और स्विट्जरलेंड। रिसर्च कॉरपोरेशन फॉर साइंस एडवांसमेंट के डॉ. रिचर्ड वीनर के मुताबिक बहुत से आधुनिक पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रों में लोग खुद को धर्म से अलग करते जा रहे हैं। नीदरलैंड में जहां ऐसे लोगों की संख्या 40 फीसदी है तो चेक गणराज्य में 60 फीसदी लोगों ने किसी धर्म के प्रति प्रतिबद्धता नहीं दिखाई है। सवाल उठता है कि धर्म की जकड़ कम होने की इन खबरों के बीच ऐसी खबरें भी आती रहती हैं कि किस तरह आबादी का एक हिस्सा धर्मगुरुओं की शरण में है। फिर वह बौद्ध मत का प्रचार करने वाला कोई बौद्ध भिक्षु हो या हिंदू आस्था का प्रचारक कोई साधु। अमेरिका के टेक्सास प्रांत के ऑस्टिन में दो सौ एकड़ में फैले अयोध्या में जन्मे बरसाना धाम के संचालक प्रकाशानंद सरस्वती अपने भक्तों के बीच श्री स्वामीजी के नाम से जाने जाते ऐसी ही शख्सियत रहे हैं। यह अलग बात है कि इन दिनों वह फरार चल रहे हैं। दरअसल, अदालत ने 82 वर्षीय प्रकाशानंद सरस्वती पर लगे बाल यौन अत्याचार के सभी बीस आरोपों को सही पाया और सजा सुना दी। 30 वर्ष की श्यामा रोज और 27 वर्षीया वेसला टोनेसेन हेज काउंटी कोर्ट के सामने अपने आंसुओं को रोक नहीं सकीं, जब अदालत ने अपना फैसला सुनाया। गौरतलब था कि दोनों महिलाओं के परिवार आश्रम में ही रहते थे और आज भी वहीं रहते हैं। इन दो किशोरियों के साथ यौन अत्याचार का सिलसिला तब शुरू हुआ, जब वे 12 साल की थीं। प्रकाशानंद के भक्त उनके माता-पिता ने इन किशोरियों की शिकायतों पर गौर करने के बजाय उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि एक तरह उन्हें गुरु का आशीर्वाद मिल रहा है। बहरहाल, अदालत ने सारे प्रमाणों को देखते हुए स्वामीजी के खिलाफ फैसला दिया। किशोरियों के साथ यौन अत्याचार जैसी जघन्य घटनाओं के लिए सरकारी वकील ने उन्हें हर अपराध के लिए बीस साल यानी चार सौ साल सजा सुनाने की अपील की थी। निश्चित ही अध्यात्म के नाम पर यौन अपराधों तथा अन्य किस्म के दुराचरणों में लिप्त प्रकाशानंद कोई पहले शख्स नहीं हैं। उल्टे अपने भक्तजनों को इहलोक की चिंताओं को छोड़ परलोक की चिंता करने का उपदेश देने वाले आध्यात्मिक गुरु इन दिनों ऐसे ही बेहद गैरआध्यात्मिक कारणों से सुर्खियों में रहते हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं बीता, जब अखबार में एक अन्य स्वामी प्रेमानंद की मृत्यु का समाचार छपा था। यह जनाब 90 के दशक में तब पहली दफा सुर्खियों में आए, जब तिरूचिरापल्ली स्थित इनके आश्रम में अपनी 13 शिष्याओं के साथ यौन अत्याचार की खबर बनी और बाद में अपने एक सहयोगी की हत्या का आरोप भी इन पर लगा। इनके खिलाफ इतने पुख्ता सबूत थे कि सुप्रीमकोर्ट ने भी इन्हें दो बार उम्रकैद की सजा सुनाई थी। वैसे चाहे प्रकाशानंद या प्रेमानंद को जो गौरव हासिल नहीं हो सका, वह दक्षिण के एक सूफी संत का अपने आप को अवतार बताने वाले बेहद चर्चित अन्य बाबा को हासिल हुआ। कुछ समय पहले बीबीसी ने इन पर केंद्रित अपनी एक डाक्युमेंटरी में उन तमाम लोगों को पेश किया, जिनके साथ उन्होंने कथित तौर पर यौन अत्याचार किया था। लंदन के डेली टेलीग्राफ ने भी अपनी एक कवर स्टोरी में उनके कथित अपराधों की सूची जारी की थी, जिसके केंद्र में 20 वर्षीय अमेरिकी युवा सैम यंग की दास्तां भी शामिल थी, जो बाबा के दो भक्तों का बेटा था, जो लंबे समय से उपरोक्त बाबा के दर्शन के लिए आते थे। 16 साल की उम्र में डरा-धमकाकर उसके साथ यौन क्रीड़ाओं का जो सिलसिला बाबा ने शुरू किया, उस पर तभी परदा हट सका, जब उसने 20 साल की उम्र में अपने माता-पिता को सबकुछ बता दिया। कुछ साल पहले एक लेख रिलीजन अंडर ग्लोबलाइजेशन में पी राधाकृष्णन ने लिखा था कि एक बार जब खुद को भगवान घोषित करने वाले इस बाबा की करतूतों पर से परदा हटा, तब सैकड़ों ऐसे मामले सामने आए। फिर विदेशों में चल रहे इनके तमाम केंद्र बंद भी हो गए। अगर आप ऑस्ट्रेलिया की यात्रा पर जाएं तो वहां हवाई अड्डों पर ही इस बाल यौन अत्याचारी संत से बचने की सलाह देते पोस्टर मिल जाएंगे। अपराध और अध्यात्म का संगम सिर्फ खास धर्मो तक सीमित नहीं है। सूचना के अधिकार के तहत केरल पुलिस द्वारा पिछले दिनों जारी किए गए आंकड़े बताते हैं कि सूबे के 63 ईसाई धर्मगुरुओं के खिलाफ फिलवक्त आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। भारत की दंड विधान संहिता के तहत आने वाले सभी किस्म के अपराधों में पादरी लोगों की संलिप्तता पाई गई है। विगत सात साल के अपराध के आंकड़ों को देखें तो दो पादरी हत्या के आरोपी हैं, जबकि दस पादरियों पर हत्या की कोशिश का इल्जाम लगा है। एक अन्य जनाब हत्या में मदद पहुंचाने के जुर्म में सलाखों के पीछे हैं। पांच लोग बलात्कार के आरोपी हैं, जबकि कोल्लम के फादर जोसेफ अनैतिक व्यापार में अभियुक्त हैं। पांच पादरियों पर चोरी और मकानों में सेंध लगाने के इल्जाम लगे हैं। रोमन कैथोलिक चर्च के अंदर बच्चों के साथ चल रहे यौन अत्याचार की घटनाओं से पिछले कुछ सालों से लगातार परदा उठ रहा है और जिसके लिए चर्च को आधिकारिक तौर पर माफी भी मांगनी पड़ी है। वैसे चर्च के कर्ताधर्ताओं पर इस बात का भी दोषारोपण किया जा रहा है कि उन्होंने यौन अत्याचारी पादरियों के खिलाफ मिली शिकायतों के बावजूद उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की और ऐसे अपराधियों को बचाने का ही काम किया। यहां तक कि वर्तमान पोप की लंदन यात्रा को लेकर भी संशय बना हुआ था कि उन दिनों इस मामले में उनकी भूमिका भी संदेह के घेरे में थी। वैसे हिंदुस्तान के समाज सियासी हालात पर एक सरसरी निगाह डालने से भी अंदाजा लगेगा कि यहां साधुओं के प्रति प्रेम कुछ ज्यादा ही है। अगर ऐसा नहीं होता तो एक अनुमान के मुताबिक पूरे मुल्क में 80 लाख से ज्यादा ऐसे छोटे-बड़े साधु नहीं दिखाई देते। आप पाएंगे कि एक लंबा-चौड़ा दायरा है, जिसके एक छोर पर जादू-टोना, प्रेतबाधा से मुक्ति की गारंटी देने वाले या संतानप्राप्ति को सुनिश्चित करने वाले तांत्रिकों-जैसे सब-आल्टर्न साधुओं से लेकर ज्यादा से ज्यादा समय विदेशों में रहने वाले और कभी-कभार इस शहर या उस शहर धार्मिक प्रवचनों को संबोधित करने वाले बापुओं-आचार्यो का मेला लगा है। आजादी के बाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उद्योगों को आधुनिक भारत का मंदिर कहा था और आज जब हम गणतंत्र की 61वीं सालगिरह मना चुके हैं, तब हम पा रहे हैं कि आध्यात्मिकता के प्रति आकर्षण गोया आज एक नए उद्योग में रूपांतरित हो गया हैं। और आध्यात्मिकता की हमारी प्यास की सबसे बड़ी कीमत बच्चे चुका रहे हैं, जो कहीं इस आश्रम में तो किसी अन्य चर्च में यौन अत्याचारों के शिकार बन रहे हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
Thursday, March 24, 2011
Wednesday, March 23, 2011
Monday, March 7, 2011
वेद कैसे धर्मग्रंथ?
देश की वर्तमान सामाजिक स्थितियों पर पड़ोस के एक राज्य में धार्मिक सम्मेलन था। सम्मेलन आर्यसमाजी विचारकों था। आयोजक ने मुझे भी आमंत्रित किया था। कोई भी धार्मिक संगठन देश के किसी भी मुद्दे पर र्चचा करे,अंतत: वह उनकी धार्मिक आस्थाओं पर केन्द्रित हो जाती है। यहां भी यही हुआ। दो वक्ताओं की बात अयोध्या में राममंदिर निर्माण की बाधाओं तक जा पहुंची। मैं नहीं जानता स्वयं स्वामी दयानंद सरस्वती की इन भाषणों पर क्या प्रतिक्रिया होती जो कृष्ण-राम को खारिज करते थे और उनके साहित्य को नदी में फेंकने की बात कहते थे। जिस राम मंदिर को वे उत्साही वक्ता हिन्दुत्व की अस्मिता से जोड़ रहे थे उसी ‘हिंदू’ शब्द को खारिज करके स्वामी दयानंद ने आर्य को जातीय संज्ञा दी थी। वे जानते थे कि किसी भी वैदिक ग्रंथ में हिंदू शब्द नहीं है। फारसी भाषियों ने इसका प्रयोग इसलिए किया था कि उनके शब्द कोषों में ‘हिंदू’ का अर्थ ‘काला’ जैसे अर्थ में हुआ था। उक्त सेमिनार में यह भी कहा गया कि वेद सृष्टि के आदि में ईश्वर द्वारा रचे गए थे और वे दुनिया की प्राचीनतम पुस्तक हैं। दोनों ही बातें किसी तार्किक व्यक्ति के गले नहीं उतर सकतीं। स्वयं स्वामी दयानन्द ने ऋ ग्वेदादि भाष्य-भूमिका में लिखा था- सकल जगत ईश्वर द्वारा रचा गया तो वेदों की रचना में क्या शंका? माना जाता है कि वेद सृष्टि की रचना के साथ ही रचे गए और जैसे रचे गए थे वैसे ही आज भी हैं। उनमें कभी कोई फेरबदल नहीं हुआ। यहां यह याद दिलाना अप्रासंगिक नहीं होगा कि उत्तरवैदिक काल के एक वैयाकरण कौरस ने कहा था कि वेद अर्थहीन किताबें हैं। खैर, हम संक्षेप में यह देखेंगे कि क्या वेदों का स्वरूप वैसे का वैसा है या उसमें फेरबदल हुई है। एक शाखा के अनुसार ऋग्वेद में 8 अष्टक, 64 अध्याय और 2006 वर्ग हैं लेकिन एक अन्य शाखा के अनुसार 10 मंडल, 85 अनुवाक और हर अनुवाक में सूक्त हैं। सूक्तों की संख्या 1017 मानी जाती है पर इनमें बालखिल्य के 11 सूक्त छोड़ दिए गए हैं। क्यों? ऋ ग्वेद के मंत्रों की कुल संख्या 10472 मानी गयी है लेकिन शौनक मंत्रों की संख्या 10528 मानते हैं। ऋ ग्वेद शाकल संहिता के दसवें मंडल में मंत्रों की संख्या कुल 15,000 बतायी गयी है। बाष्कल शाखा में तो 10वां मंडल है ही नहीं। शाकल संहिता में कुल मंत्र 10,517 हैं तब बाकी 4,483 मंत्र कहां और क्यों गायब हुए? वेद ईश्वर कृत हैं इसके बावजूद एक आदमी (या ऋ षि ) उनमें इतने फेरबदल कैसे कर देता है? दुनिया में किसी भी धर्मग्रंथ में कभी कोई फेरबदल नहीं की गई-न बाइबिल में, न कुरान में। इनमें कभी किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया। लेकिन वेद की 31 शाखाएं हो गई और हर शाखा में पाठ भेद है। शाखाओं की उपशाखाएं भी हैं और उनमें भी भारी अन्तर हैं। आधुनिक समय के वेदों के सबसे बड़े अध्येता सत्यव्रत सामाश्रमि भट्टाचार्य की टिप्पणी देखनी चाहिए-जैसे अध्यायभेद होता है उस तरह शाखाभेद नहीं समझना चाहिए। अलग-अलग समय और अलग- अलग स्थान पर महत्त्वपूर्ण पुस्तक में जैसे हो जाता है उसी तरह पाठ भेद को समझा जाना चाहिए। लेकिन सामाश्रमि यह भूल जाते हैं कि यह पाठभेद लगभग एक ही क्षेत्र के विद्वानों ने किया था। वैदिक साहित्य में एक दिलचस्प किताब है- विकृति बल्लरी। इसके लेखक थे व्याडि। उन्होंने यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि कैसे शाकल की जो पांचों शाखाओं में पाठभेद हैं वे पाठ भेद नहीं हैं। क्या कुरान की भी कोई शाखाएं और पाठभेद हैं? जो कुरान को ईश्वरीय मानते हैं, वे उसमें पाठभेद करने की हिम्मत नहीं करते। ऋ ग्वेद की बाष्कल संहिता के सूक्तों से शाकल में आठ सूक्त कम हैं। यह कैसे हुआ? ऋ ग्वेद में बालखिल्य के कहीं तो 11 सूक्त हैं कहीं आठ। एक तथ्य और हैरान करता है-ऋ ग्वेद के अनेक भाष्यकारों ने सिर्फ शाकल संहिता का ही भाष्य किया है पर हर भाष्यकार हर मंत्र का अलग अर्थ देता है। सायण, महीधर, स्कंद स्वामी, माधव भट्ट यहां तक कि स्वामी दयानंद ने भी वेद मंत्रों के जो भाष्य किए हैं वे एक दूसरे से बहुत अलग और परस्पर विरोधी भी हैं। तब वेद किस तरह के ईश्वरीय धर्मग्रंथ है? क्या अन्तत: कौत्स ही सही है कि वेद निर्थक ध्वनियां मात्र हैं?
गोपेश्वर में भी है बाबा अमरनाथ का हिम शिवलिंग
जम्मू-कश्मीर की तरह ही उत्तराखंड के गोपेश्वर क्षेत्र में भी बाबा अमरनाथ का वास है, जो नीति महादेव के नाम से विख्यात हैं। चीन सीमा पर स्थित अंतिम भारतीय गांव नीति में गुफा के अंदर स्थित हिम शिवलिंग का वर्षभर प्राकृतिक जलधारा से जलाभिषेक होता रहता है। बाबा अमरनाथ की भांति ही यहां गर्मियों में श्रद्धालु हिम शिवलिंग के दर्शन करने आते हैं। तिब्बत से सटे उत्तराखंड के सीमांत जिले चमोली के जोशीमठ विकासखंड में एक गांव है नीति। गांव के पास टिम्बरसैंण से लगभग आधा किमी की चढ़ाई चढ़कर नीति महादेव पहुंचा जाता है। नीति महादेव भी अमरनाथ की भांति गुफा के अंदर हैं। यहां के ग्रामीणों के आराध्य नीति महादेव में अन्य मंदिरों की भांति भगवान का शिवलिंग हैं। ग्रीष्मकाल में ग्रामीणों के अलावा भारत-तिब्बत सीमा पुलिस और भारतीय सेना के जवान यहां पूजा करने आते हैं। नीति गांव के ग्रामीण 87 वर्षीय राम सिंह राणा का कहना है कि नीति महादेव में पहले पूरे वर्ष बर्फ का शिवलिंग होता था, जो अब केवल अप्रैल तक ही दिखता है। उन्होंने कहा, ग्रामीण आज भी परंपरागत तरीके से नीति महादेव की पूजा करते आ रहे हैं। गुफा में जाने से पहले श्रद्धालुओं को पवित्र झरने में स्नान करना पड़ता है। बदरीनाथ विधान सभा क्षेत्र के विधायक और पूर्व मंत्री केदार सिंह फोनिया का कहना है कि भारत की सीमाओं पर शैवमत का बोलबाला रहा है। शायद इसी दौरान कश्मीर में अमरनाथ, हिमाचल व उत्तराखंड में भी कई शिव मंदिर स्थापित किए गए। बचपन में मैंने भी माता-पिता के साथ वहां पहुंचकर बर्फ के शिवलिंग के दर्शन किए हैं। वहीं, आईटीबीपी की आठवीं बटालियन के सहायक सेनानी नरेन्द्र सिंह टोलिया का कहना है कि नीति महादेव को भी अमरनाथ की तर्ज पर प्रोत्साहित किया जाए तो सीमा के गावों से पलायन रुकेगा और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
Friday, March 4, 2011
Thursday, March 3, 2011
राष्ट्रीय संस्कृति के प्रेरक देव शिव
स्वामी करपात्रीजी शिव को राष्ट्र देवता के रूप में मूल्यांकित करते हुए कहते हैं- ‘समुद्र मंथन में निकलने वाले कालकूट विष का भगवान शंकर ने स्वयं पान किया और अमृत देवताओं को दिया। राष्ट्र के नेता का भी यही कर्त्तव्य है कि उत्तम वस्तु राष्ट्र के अन्यान्य लोगों को देनी चाहिए और अपने लिए परिश्रम, त्याग तथा तरह-तरह की कठिनाइयों को ही रखना चाहिए। विष का भाग राष्ट्र को देने से उसका सर्वनाश हो जाएगा।’ आज हमारा देश शिव के इस लोकोपकारी चरित्र को भूल जाने के कारण अनेक समस्याओं से जूझ रहा है
फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि के नाम से जानी जाती है। ईशान संहिता में इसे ‘महानिशा’ कहा गया है। इसी घोर अन्धकार की अर्धरात्रि में शिव करोड़ों सूयरे के समान तेजस्वी होकर पृथिवी से लिंग रूप में प्रकट हुए थे। धार्मिक दृष्टि से शिवरात्रि के चार प्रहरों में दूध, दही, घृत तथा मधु से शिव की चार मूर्तियों- ईशान मूर्ति, अघोर मूर्ति, वामदेव मूर्ति तथा सद्योजात मूर्ति का क्रमश: अभिषेक करने का विधान है। प्रभातकाल में विसर्जन के बाद अमावस्या को व्रत या उपवास की पारणा करते हुए शिव से यह प्रार्थना करनी चाहिए कि ‘हे शंकर! मैं नित्य संसार की यातना से उत्पीड़ित हूं। अत: आप इस व्रत से सन्तुष्ट होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करें।’
सभी देवताओं की पूजा प्राय: दिन में की जाती है किन्तु भगवान शिव को रात्रि अति प्रिय है, वह भी फाल्गुन कृष्णपक्ष की घोर अन्धकारमय चतुर्दशी की रात्रि। पौराणिक मान्यता के अनुसार शिवरात्रि के दिन शिव का पार्वती से विवाह हुआ था। महाकाल शिव की यह शक्ति भी महाकाली अथवा कालरात्रि के नाम से जानी जाती है, जिसे शिव की अर्धागिनी माना गया है। परन्तु समाज-वैज्ञानिक धरातल पर शिव की रात्रिपूजा का कारण यह है कि जब संसार अन्याय और अत्याचार के घोर महानिशा काल से विचरण करता है तो धरती के उदर से प्रकट होता कोई सूर्य जैसा देव अपनी संहार शक्ति की तेजस्विता से उसे अन्धकारपूर्ण कालरात्रि से मुक्ति दिलाता है। यही कारण है कि सृष्टि के आदिकाल से ही आदिवासी समाज व्यवस्था में शिवपूजा भारत में ही नहीं अपितु समूचे विश्व में लोकप्रिय रही है। भारत सहित मिस्र, रोम, फ्रांस, जर्मनी, इन्डोचायना आदि विश्व के अनेक देशों तथा अनेक धर्मो के अनुयायियों के मध्य अपने-अपने स्तर पर शिवलिंग की पूजा-अर्चना के ऐतिहासिक अवशेष मिलते हैं। उत्तर अफ्रीका के ‘मेफिस’ और ‘अशीरिश’ नामक क्षेत्रों में नन्दी पर विराजमान तथा त्रिशूलधारी शिव की अनेक मूर्तियां हैं जिनकी वहां के लोग बेलपत्र से पूजा करते हैं और दूध से अभिषेक भी किया जाता है। तुर्किस्तान के बॉबीलोन नगर में विश्व का सबसे बड़ा शिवलिंग मौजूद है जिसकी ऊंचाई बारह सौ फुट बताई जाती है। रोम, यूनान और मिस्र में उसी फाल्गुन मास के वसन्तोत्सव पर लिंग पूजा का वार्षिक पर्व मनाया जाता था जिस मास में भारतवासी भी शिवरात्रि का पर्व मनाते हैं। पश्चिमी जगत में लिंग पूजा ‘फैल्लस वरशिप’ के रूप में प्रचलित है। प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल टॉड के अनुसार ‘फैल्लस’ की उत्पत्ति संस्कृत के ‘फलेश’ से हुई है क्योंकि शिव यज्ञ, पूजा आदि फल शीघ्र देने के कारण ‘फलेश’ कहलाते हैं। इन्डो चायना में संस्कृत के 92 ऐसे अभिलेख मिले हैं जिनका प्रारम्भ ‘ऊँ नम: शिवाय’ महामन्त्र से होता है। भारतीय परम्परा में शिव परब्रrा, परमात्मा, रुद्र, महादेव आदि विभिन्न नामों से जाने जाते हैं। ‘शिव’ शब्द की एक व्याख्या के अनुसार अनन्त तापों से संतप्त होकर प्राणी जहां विश्राम हेतु शयन करते हैं अथवा पल्रय की अवस्था में जगत जिसमें शयन करता है, उसे ‘शिव’ कहते हैं - ‘शेरते प्राणिनो यत्रा स शिव:’
अथवा ‘शेते जगदस्मिति शिव:।’ भगवान राम तथा कृष्ण का आविर्भाव क्रमश: त्रेता तथा द्वापर युग में होता है किन्तु शिव सृष्टि के आदिकाल से ही असहाय और निर्बल प्राणियों की रक्षा करने वाले एकमात्र देव हैं। आखेट युग में जब मनुष्य पशुओं का शिकार करता था तो पशुपति शिव आखेटकों को अपने धनुष- बाण से डराकर असहाय तथा निर्बल प्राणियों की रक्षा करते थे। शिव के देवत्व की यह विशेषता है कि वे प्रत्येक युग में दीन-हीन, निर्बल, असहाय तथा सर्वहारा वर्ग के संरक्षक देव हैं। प्राणिमात्र का परम मित्र होने के कारण शिव को ‘महादेव’ कहा जाता है। भागवतपुराण का कथन है कि जब देव और दानव एक दूसरे के प्राण लेने पर तुले हुए थे तो कालकूट विष का पान करके भगवान शिव ने प्रजा-कल्याण का महान कार्य किया। स्वामी करपात्री जी शिव को राष्ट्र देवता के रूप में मूल्यांकित करते हुए कहते हैं- ‘समुद्र मन्थन में निकलने वाले कालकूट विष का भगवान शंकर ने पान किया और अमृत देवताओं को दिया। राष्ट्र के नेता का भी यही कर्त्तव्य है कि उत्तम वस्तु राष्ट्र के अन्यान्य लोगों को देनी चाहिए और अपने लिए परिश्रम, त्याग तथा तरहत रह की कठिनाइयों को ही रखना चाहिए। विष का भाग राष्ट्र को देने से उसका सर्वनाश हो जाएगा।’ आज हमारा देश शिव के इस लोकोपकारी चरित्र को भूल जाने के कारण ही अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। शिव भारतीय संस्कृति के प्रेरक देव है। उत्तर में कैलाश, अमरनाथ, केदारनाथ से लेकर धुर दक्षिण में कन्या कुमारी तथा सेतुबन्ध रामेश्वरम तक, पूर्व में असम से लेकर पश्चिम में द्वारका तक शिव आराधना के ऐतिहासिक अवशेष मिलते हैं जिनसे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रागैतिहासिक काल से लेकर आधुनिक काल तक पूरे भारतराष्ट्र में शिवपूजा का व्यापक प्रचार व प्रसार रहा है। भारतवर्ष की प्राचीन राष्ट्रीय संस्कृति के निर्माण में केवल एक धर्म और जाति की भूमिका नहीं है बल्कि आर्य-अनार्य, देव-राक्षस, शक-यवन, यक्ष-किन्नर, नाग-गन्धर्व आदि विभिन्न धर्मावलम्बियों और जनजातियों ने भारत की मिली-जुली संस्कृति का निर्माण करने में अहम भूमिका निभाई है पर देखने की बात यह है कि आर्य और अनार्य तथा आभिजात्य और सर्वहारा दोनों धर्म चेतनाओं को एक राष्ट्र के रूप में जोड़ने की प्रेरणा आदि देव शिव के देवत्व से ही प्राप्त होती है। भारतीय देवशास्त्र में शिव ऐसे विलक्षण देव हैं जिनके आदि और अन्त का पता नहीं। उनके पास धन-ऐश्वर्य का अक्षय भंडार है किन्तु अपने रहने के लिए एक आवास भी नहीं। शिव अर्धनारीश्वर होने के बाद भी कामवासना से सर्वथा शून्य हैं। अपनी आठों शक्तियों से पूरे ब्रrांड पर शासन करने के बाद भी वे श्मशानवासी हैं। शिव सरल इतने हैं कि पत्र, पुष्प और जल के अर्पण मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं। इसीलिए ‘आशुतोष’
कहलाते हैं। शिव भारत की राष्ट्रीय संस्कृति में रचे-बसे अत्यन्त लोकप्रिय देव हैं। भारतीय, धर्म, दर्शन, संस्कृति, तन्त्र मन्त्र, गीत, संगीत यहां तक कि व्याकरण शास्त्र भी शिव तत्व के गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा। कहीं नटराज के रूप में तो कहीं महेश्वर-सूत्र के रूप में शिव ज्ञान-विज्ञान के भी अधिपति देव बन गए। धर्म, संस्कृति तथा सामाजिक उत्सव- महोत्सवों में भी महादेव शिव, उनकी अर्धागिनी पार्वती, पुत्र गणोश और कार्तिकेय सहित समूचे शिव परिवार का वर्चस्व बढ़ता गया। शिवपुत्र गणोश तो इतने लोकप्रिय हुए कि उनकी पूजा के बिना कोई भी काज अधूरा ही माना जाने लगा। वस्तुत: शिव जैसे गूढ़ आध्यात्मिक देव की पहचान भी भारत जैसे पुरातन आध्यात्मिक राष्ट्र के सन्दर्भ में ही की जा सकती है। शिव के इस आदिकालीन देवताविज्ञान ने भारत राष्ट्र के आध्यात्मिक चरित्र का निर्माण किया अथवा भारतीय राष्ट्रवाद के सतत प्रवाह ने विश्व को शिव जैसा अद्भुत देव दिया, कहना कठिन है किन्तु पुराणों में शिव के जिन छह लक्षणों को गिनाया गया है, वे भारतराष्ट्र के सन्दर्भ में भी उतने ही प्रासंगिक है।
Wednesday, March 2, 2011
महाशिवरात्रि दुनियाभर के अनुयायियों का पवित्र पर्व
सृष्टि के विनाश व पुनस्र्थापन के बीच की कड़ी है पल्रय। यानी कष्ट, पुनस्र्थापन अर्थात सुख। अत: ज्योतिष में शिव को सुखों का आधार मान कर महाशिवरात्रि पर अनेक प्रकार के अनुष्ठान करने की महत्ता प्रचलित है
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को सृष्टि के प्रारंभ में मध्यरात्रि भगवान शंकर का ब्रrा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। पल्रय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रrांड को तीसरी नेत्र-ज्वाला से समाप्त कर देते हैं, इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया। तीनों भुवनों की अपार सुंदरी तथा शीलवती गौरा को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका रूप बड़ा अजीब है। शरीर पर श्मशानों की भस्म, गले में सपरे का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में पल्रयंकर ज्वाला है। बैल को वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते और श्री-संपत्ति प्रदान करते हैं। इस दिन, शिवभक्त शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर बेल-पत्र आदि चढ़ाते, पूजन करते, कुछ लोग उपवास करते तो कुछ भक्त जलाभिषेक बाद अन्न ग्रहण करते हैं। वे रात्रि को जागरण करते हैं। शिवालयों में स्थापित पवित्र शिवलिंग पर बेल-पत्र चढ़ाना, उपवास तथा रात्रि जागरण करना एक विशेष कर्म की ओर इशारा करता है। इस दिन शिव की शादी हुई थी, इसलिए रात्रि में शिवजी की बारात निकाली जाती है। वास्तव में, शिवरात्रि का परम पर्व स्वयं परमपिता परमात्मा के पृथ्वी पर अवतरित होने की स्मृति दिलाता है। यहां ‘रात्रि’ शब्द अज्ञान- अंधकार से होने वाले नैतिक पतन का द्योतक है। परमात्मा ही ज्ञान सागर है जो मानव मात्र को सत्य ज्ञान द्वारा अंधकार से प्रकाश की ओर अथवा असत्य से सत्य की ओर ले जाते हैं। ब्राrाण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री-पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध सभी इस व्रत को कर सकते हैं। इस व्रत के विधान में सवेरे स्नानादि से निवृत्त होकर उपवास रखा जाता है। इस दिन मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर, ऊपर से बेलपत्र, धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर ‘शिवलिंग’ पर चढ़ाया जाता है। अगर पास में शिवालय न हो, तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर उसे पूजने का विधान है । रात्रि को जागरण करके ‘शिवपुराण’ का पाठ सुनना हरेक व्रती का धर्म माना गया है। अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेलपत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है। महाशिवरात्रि भगवान शंकर का सबसे पवित्र दिन है। यह अपनी आत्मा को पुनीत करने का महाव्रत है। इसके करने से सब पापों का नाश होता है। हिंसक प्रवृत्ति बदल जाती है। निरीह जीवों के प्रति दया भाव उपजता है। ईशान संहिता में इसकी महत्ता का उल्लेख इस प्रकार किया गया है-शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापं पण्रान्। आचाण्डाल मनुष्याणं भुक्ति मुक्ति प्रदायकं? विशेष चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं। अत ज्योतिष शास्त्रों में इसे परम शुभदायी कहा गया है। वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है, परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि कहा गया है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, सूर्य देव भी इस समय तक उत्तरायण में आ चुके होते हैं तथा ऋतु- परिवर्तन का यह समय अत्यन्त शुभ कहा गया हैं। शिव का अर्थ है- कल्याण। शिव सबका कल्याण करने वाले हैं। अत: महाशिवरात्रि पर सरल उपाय करने से ही इच्छित सुख की प्राप्ति होती है। ज्योतिषीय गणित के अनुसार, चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी क्षीणस्थ अवस्था में पहुंच जाते हैं। जिस कारण बलहीन चंद्रमा सृष्टि को ऊर्जा देने में असमर्थ होते हैं। चंद्रमा का सीधा संबंध मन से कहा गया है। अब मन कमजोर होने पर भौतिक संताप प्राणी को घेर लेते हैं तथा विषाद की स्थिति उत्पन्न होती है, जिससे कष्टों का सामना करना पड़ता है। चंद्रमा शिव के मस्तक पर सुशोभित है। अत चंद्रदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव का आश्रय लिया जाता है। महाशिवरात्रि शिव की प्रिय तिथि है। अत: प्राय: ज्योतिषी शिवरात्रि को शिव आराधना कर कष्टों से मुक्ति पाने का सुझाव देते हैं। शिव आदि-अनादि हैं। सृष्टि के विनाश व पुनस्र्थापन के बीच की कड़ी है। पल्रय यानी कष्ट, पुनस्र्थापन यानी सुख। अत: ज्योतिष में शिव को सुखों का आधार मान कर महाशिवरात्रि पर अनेक प्रकार के अनुष्ठान करने की महत्ता कही गई है। अनुष्ठान कारोबार वृद्धि के लिए महाशिवरात्रि के सिद्ध-मुहूर्त में पारद शिवलिंग को प्राण-प्रतिष्ठित करवाकर स्थापित करने से व्यवसाय में वृद्धि व नौकरी में तरक्की मिलती है। बाधा नाश के लिए शिवरात्रि के प्रदोष काल में स्फटिक शिवलिंग को शुद्ध गंगा जल, दूध, दही, घी, शहद व शक्कर से स्नान करवाकर धूप-दीप जलाकर निम्नलिखित मंत्र का जाप करने से समस्त बाधाओं का शमन होता है। ‘ú तत्पुरुषाय विदमहे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात?’ बीमारी से छुटकारे के लिए शिव मंदिर में लिंग पूजन कर दस हजार मंत्रों का जाप करने से प्राण रक्षा होती है। महामृत्युंजय मंत्र का जाप रुद्राक्ष की माला पहनकर करें। शत्रु नाश के लिए शिवरात्रि को रुद्राष्टक का पाठ यथासंभव करने से शत्रुओं से मुक्ति मिलती है। मुकदमे में जीत व समस्त सुखों की प्राप्ति होती है। मोक्ष के लिए शिवरात्रि को एकमुखी रुद्राक्ष को गंगाजल से स्नान करवाकर धूप-दीप दिखा कर तख्ते पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। शिव रूप रुद्राक्ष के सामने बैठ कर सवा लाख मंत्र जप का संकल्प लेकर जाप आरंभ करें। जप शिवरात्रि के बाद भी जारी रखें- ú नम शिवाय। बुद्धि योग लगाकर उनके समीप रहें। उपवास का अर्थ ही है उपवास अर्थात समीप रहना। जागरण का सच्चा अर्थ है- काम, क्रोध आदि पंच विकारों के वशीभूत होकर अज्ञान- रूपी कुम्भकरण की निद्रा में सो जाने से स्वयं को सदा बचाए रखना। शिवरात्रि के पर्व पर जागरण का महत्व है। एक कथा प्रचलित है कि एक बार पार्वतीजी ने भगवान शिवांकर से पूछा, ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं। उत्तर में शिवजी ने पार्वती को शिवरात्रि के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- एक गांव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से, उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनर्चया की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था, जो बेलपत्रों से ढंक गया था। शिकारी को उसका पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी पूरा हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, ‘मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।’ शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई। कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, ‘हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊं गी।’ शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार खो देने के चलते उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं की। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, ‘हे पारधी! मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।’
शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं। मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है, तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो । मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा। मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अत: जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं। उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था! उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय करुणभावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चात्ताप की ज्वाला में जलने लगा। थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी बह निकली। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव-हिंसा से हटाकर सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प- वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए। ‘धर्म महासंघ’ के प्रधान सुखवीर सरन अग्रवाल के अनुसार, राजधानी में छोटे-बड़े 400 से अधिक शिवालयों में महाशिवरात्रि पर अनुष्ठान होता है। आद्य कात्यायनी शक्तिपीठ- छतरपुर, श्री कालिका पीठ कालका जी मंदिर, कालका जी, बद्री भगत झंडेवालान मंदिर, करोलबाग, श्री शिव मंदिर, प्रीत विहार, श्री हनुमान मंदिर, बाबा खड़गसिंह मार्ग, श्री संतोषी माता मंदिर, हरीनगर, श्रीगौरी शंकर मंदिर, चांदनी चौक, पांडवकालीन मंदिरों के नाम से विख्यात दूधिया शिव मंदिर, मथुरा रोड प्रमुख हैं। दूधिया मंदिर का ऐतिहासिक महत्व है, यहां पर सिर्फ शंकर भगवान के शिवलिंग पर दुग्धाभिषेक किया जाता है, जहां हर समुदाय के लोग पहुंचते हैं।
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