स्वामी करपात्रीजी शिव को राष्ट्र देवता के रूप में मूल्यांकित करते हुए कहते हैं- ‘समुद्र मंथन में निकलने वाले कालकूट विष का भगवान शंकर ने स्वयं पान किया और अमृत देवताओं को दिया। राष्ट्र के नेता का भी यही कर्त्तव्य है कि उत्तम वस्तु राष्ट्र के अन्यान्य लोगों को देनी चाहिए और अपने लिए परिश्रम, त्याग तथा तरह-तरह की कठिनाइयों को ही रखना चाहिए। विष का भाग राष्ट्र को देने से उसका सर्वनाश हो जाएगा।’ आज हमारा देश शिव के इस लोकोपकारी चरित्र को भूल जाने के कारण अनेक समस्याओं से जूझ रहा है
फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि के नाम से जानी जाती है। ईशान संहिता में इसे ‘महानिशा’ कहा गया है। इसी घोर अन्धकार की अर्धरात्रि में शिव करोड़ों सूयरे के समान तेजस्वी होकर पृथिवी से लिंग रूप में प्रकट हुए थे। धार्मिक दृष्टि से शिवरात्रि के चार प्रहरों में दूध, दही, घृत तथा मधु से शिव की चार मूर्तियों- ईशान मूर्ति, अघोर मूर्ति, वामदेव मूर्ति तथा सद्योजात मूर्ति का क्रमश: अभिषेक करने का विधान है। प्रभातकाल में विसर्जन के बाद अमावस्या को व्रत या उपवास की पारणा करते हुए शिव से यह प्रार्थना करनी चाहिए कि ‘हे शंकर! मैं नित्य संसार की यातना से उत्पीड़ित हूं। अत: आप इस व्रत से सन्तुष्ट होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करें।’
सभी देवताओं की पूजा प्राय: दिन में की जाती है किन्तु भगवान शिव को रात्रि अति प्रिय है, वह भी फाल्गुन कृष्णपक्ष की घोर अन्धकारमय चतुर्दशी की रात्रि। पौराणिक मान्यता के अनुसार शिवरात्रि के दिन शिव का पार्वती से विवाह हुआ था। महाकाल शिव की यह शक्ति भी महाकाली अथवा कालरात्रि के नाम से जानी जाती है, जिसे शिव की अर्धागिनी माना गया है। परन्तु समाज-वैज्ञानिक धरातल पर शिव की रात्रिपूजा का कारण यह है कि जब संसार अन्याय और अत्याचार के घोर महानिशा काल से विचरण करता है तो धरती के उदर से प्रकट होता कोई सूर्य जैसा देव अपनी संहार शक्ति की तेजस्विता से उसे अन्धकारपूर्ण कालरात्रि से मुक्ति दिलाता है। यही कारण है कि सृष्टि के आदिकाल से ही आदिवासी समाज व्यवस्था में शिवपूजा भारत में ही नहीं अपितु समूचे विश्व में लोकप्रिय रही है। भारत सहित मिस्र, रोम, फ्रांस, जर्मनी, इन्डोचायना आदि विश्व के अनेक देशों तथा अनेक धर्मो के अनुयायियों के मध्य अपने-अपने स्तर पर शिवलिंग की पूजा-अर्चना के ऐतिहासिक अवशेष मिलते हैं। उत्तर अफ्रीका के ‘मेफिस’ और ‘अशीरिश’ नामक क्षेत्रों में नन्दी पर विराजमान तथा त्रिशूलधारी शिव की अनेक मूर्तियां हैं जिनकी वहां के लोग बेलपत्र से पूजा करते हैं और दूध से अभिषेक भी किया जाता है। तुर्किस्तान के बॉबीलोन नगर में विश्व का सबसे बड़ा शिवलिंग मौजूद है जिसकी ऊंचाई बारह सौ फुट बताई जाती है। रोम, यूनान और मिस्र में उसी फाल्गुन मास के वसन्तोत्सव पर लिंग पूजा का वार्षिक पर्व मनाया जाता था जिस मास में भारतवासी भी शिवरात्रि का पर्व मनाते हैं। पश्चिमी जगत में लिंग पूजा ‘फैल्लस वरशिप’ के रूप में प्रचलित है। प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल टॉड के अनुसार ‘फैल्लस’ की उत्पत्ति संस्कृत के ‘फलेश’ से हुई है क्योंकि शिव यज्ञ, पूजा आदि फल शीघ्र देने के कारण ‘फलेश’ कहलाते हैं। इन्डो चायना में संस्कृत के 92 ऐसे अभिलेख मिले हैं जिनका प्रारम्भ ‘ऊँ नम: शिवाय’ महामन्त्र से होता है। भारतीय परम्परा में शिव परब्रrा, परमात्मा, रुद्र, महादेव आदि विभिन्न नामों से जाने जाते हैं। ‘शिव’ शब्द की एक व्याख्या के अनुसार अनन्त तापों से संतप्त होकर प्राणी जहां विश्राम हेतु शयन करते हैं अथवा पल्रय की अवस्था में जगत जिसमें शयन करता है, उसे ‘शिव’ कहते हैं - ‘शेरते प्राणिनो यत्रा स शिव:’
अथवा ‘शेते जगदस्मिति शिव:।’ भगवान राम तथा कृष्ण का आविर्भाव क्रमश: त्रेता तथा द्वापर युग में होता है किन्तु शिव सृष्टि के आदिकाल से ही असहाय और निर्बल प्राणियों की रक्षा करने वाले एकमात्र देव हैं। आखेट युग में जब मनुष्य पशुओं का शिकार करता था तो पशुपति शिव आखेटकों को अपने धनुष- बाण से डराकर असहाय तथा निर्बल प्राणियों की रक्षा करते थे। शिव के देवत्व की यह विशेषता है कि वे प्रत्येक युग में दीन-हीन, निर्बल, असहाय तथा सर्वहारा वर्ग के संरक्षक देव हैं। प्राणिमात्र का परम मित्र होने के कारण शिव को ‘महादेव’ कहा जाता है। भागवतपुराण का कथन है कि जब देव और दानव एक दूसरे के प्राण लेने पर तुले हुए थे तो कालकूट विष का पान करके भगवान शिव ने प्रजा-कल्याण का महान कार्य किया। स्वामी करपात्री जी शिव को राष्ट्र देवता के रूप में मूल्यांकित करते हुए कहते हैं- ‘समुद्र मन्थन में निकलने वाले कालकूट विष का भगवान शंकर ने पान किया और अमृत देवताओं को दिया। राष्ट्र के नेता का भी यही कर्त्तव्य है कि उत्तम वस्तु राष्ट्र के अन्यान्य लोगों को देनी चाहिए और अपने लिए परिश्रम, त्याग तथा तरहत रह की कठिनाइयों को ही रखना चाहिए। विष का भाग राष्ट्र को देने से उसका सर्वनाश हो जाएगा।’ आज हमारा देश शिव के इस लोकोपकारी चरित्र को भूल जाने के कारण ही अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। शिव भारतीय संस्कृति के प्रेरक देव है। उत्तर में कैलाश, अमरनाथ, केदारनाथ से लेकर धुर दक्षिण में कन्या कुमारी तथा सेतुबन्ध रामेश्वरम तक, पूर्व में असम से लेकर पश्चिम में द्वारका तक शिव आराधना के ऐतिहासिक अवशेष मिलते हैं जिनसे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रागैतिहासिक काल से लेकर आधुनिक काल तक पूरे भारतराष्ट्र में शिवपूजा का व्यापक प्रचार व प्रसार रहा है। भारतवर्ष की प्राचीन राष्ट्रीय संस्कृति के निर्माण में केवल एक धर्म और जाति की भूमिका नहीं है बल्कि आर्य-अनार्य, देव-राक्षस, शक-यवन, यक्ष-किन्नर, नाग-गन्धर्व आदि विभिन्न धर्मावलम्बियों और जनजातियों ने भारत की मिली-जुली संस्कृति का निर्माण करने में अहम भूमिका निभाई है पर देखने की बात यह है कि आर्य और अनार्य तथा आभिजात्य और सर्वहारा दोनों धर्म चेतनाओं को एक राष्ट्र के रूप में जोड़ने की प्रेरणा आदि देव शिव के देवत्व से ही प्राप्त होती है। भारतीय देवशास्त्र में शिव ऐसे विलक्षण देव हैं जिनके आदि और अन्त का पता नहीं। उनके पास धन-ऐश्वर्य का अक्षय भंडार है किन्तु अपने रहने के लिए एक आवास भी नहीं। शिव अर्धनारीश्वर होने के बाद भी कामवासना से सर्वथा शून्य हैं। अपनी आठों शक्तियों से पूरे ब्रrांड पर शासन करने के बाद भी वे श्मशानवासी हैं। शिव सरल इतने हैं कि पत्र, पुष्प और जल के अर्पण मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं। इसीलिए ‘आशुतोष’
कहलाते हैं। शिव भारत की राष्ट्रीय संस्कृति में रचे-बसे अत्यन्त लोकप्रिय देव हैं। भारतीय, धर्म, दर्शन, संस्कृति, तन्त्र मन्त्र, गीत, संगीत यहां तक कि व्याकरण शास्त्र भी शिव तत्व के गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा। कहीं नटराज के रूप में तो कहीं महेश्वर-सूत्र के रूप में शिव ज्ञान-विज्ञान के भी अधिपति देव बन गए। धर्म, संस्कृति तथा सामाजिक उत्सव- महोत्सवों में भी महादेव शिव, उनकी अर्धागिनी पार्वती, पुत्र गणोश और कार्तिकेय सहित समूचे शिव परिवार का वर्चस्व बढ़ता गया। शिवपुत्र गणोश तो इतने लोकप्रिय हुए कि उनकी पूजा के बिना कोई भी काज अधूरा ही माना जाने लगा। वस्तुत: शिव जैसे गूढ़ आध्यात्मिक देव की पहचान भी भारत जैसे पुरातन आध्यात्मिक राष्ट्र के सन्दर्भ में ही की जा सकती है। शिव के इस आदिकालीन देवताविज्ञान ने भारत राष्ट्र के आध्यात्मिक चरित्र का निर्माण किया अथवा भारतीय राष्ट्रवाद के सतत प्रवाह ने विश्व को शिव जैसा अद्भुत देव दिया, कहना कठिन है किन्तु पुराणों में शिव के जिन छह लक्षणों को गिनाया गया है, वे भारतराष्ट्र के सन्दर्भ में भी उतने ही प्रासंगिक है।
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