अनेकता में एकता भारतभूमि की धर्मप्राण संस्कृति की अनूठी विशेषता है। समय-समय पर देशकाल की परिस्थितियों के अनुरूप यहां कई दिव्य सत्ताएं अवतरित हुईं, जिन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त अवांछनीयता का निराकरण कर समाज को नयी व सार्थक दिशा दी। महावीर स्वामी ऐसी ही अवतारी सत्ता थे। 540 ई.पूर्व कुण्ड ग्राम (वर्तमान बिहार) के एक राजघराने में जन्मे क्षत्रिय राजकुमार वर्धमान के हृदय में समाज की वर्तमान दशा-दिशा को देखकर वेदना के अंकुर बाल्यावस्था से ही फूटने लगे थे, परन्तु पारिवारिक दायित्वों के कारण उन्हें इस दिशा में कुछ सार्थक करने का मौका 30 वर्ष की आयु में मिल पाया। जीवन उद्देश्य की प्राप्ति का सुअवसर मिलते ही उन्होंने एक पल की देरी नहीं की। गृहत्याग कर 12 वर्षो तक कठोर तप साधना के बाद कैवल्य (परमज्ञान) की प्राप्ति के बाद वह जैन धर्म के 24 वें तीर्थकर महावीर स्वामी के रूप में प्रतिष्ठित हुए। अहिंसा परमो धर्म: के प्रवर्तक के रूप में महावीर स्वामी की शिक्षाएं वर्तमान में कहीं अधिक प्रासंगिक और अनुकरणीय हैं। महावीर द्वारा अपने प्रत्येक अनुयायी (साधु व गृहस्थ दोनों वर्गो के लिए) के लिए अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मर्चय व अपरिग्रह इन पांच व्रतों का पालन अनिवार्य बताया गया है, परन्तु इन सभी में अहिंसा की भावना प्रमुख है। उनकी मान्यता है कि मानव व दानव में केवल अहिंसा का ही अंतर है। जब से मानव ने अहिंसा को भुलाया तभी से वह दानव होता जा रहा है और उसकी दानवी वृत्ति का अभिशाप आज समस्त विश्व भोगने को विवश है। संसार के प्रत्येक जीव को अपना जीवन अति प्रिय है। जो उसको नष्ट करने को उसको क्षति पहुंचाने को उद्यत रहता वह हिंसक है, दानव है। इसके विपरीत जो उसकी रक्षा करता है वह अहिंसक है और वही मानव है। यद्यपि कालान्तर में जैन धर्म के सिद्धान्तों का अक्षरश: पालन करना लोगों के लिए कठिन होने लगा फिर भी इसमें संदेह नहीं है कि महावीर स्वामी ने अपने समय में जिस अहिंसा के सिद्धांत का प्रतिपादन किया वह निर्बलता व कायरता उत्पन्न करने के बजाय राष्ट्र में शांति व अमन स्थापित करने के उद्देश्य से किया। उन्होंने तत्कालीन हिन्दू धर्म को दूषित बनाने वाली पशु बलि जैसी कुप्रथा को रोककर सामाजिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया। उनका कहना था कि पशु हत्या ही नहीं, स्वार्थपरता, बेईमानी व धोखेबाजी भी हिंसा का ही रूप है। उन्होंने समाज को जियो और जीने दो का सूत्र दिया। उन्होंने लोगों से कहा कि तुम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जो तुम दूसरों से अपने लिए चाहते हो। महावीर ने व्यक्ति के आचरण सुधार व उसे त्यागमूलक बनाने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि शासन व्यवस्था को भी अहिंसक होना चाहिए। शासन व्यवस्था में अनीति का प्रवेश हो जाने से राष्ट्र का नैतिक जीवन भ्रष्ट हो जाता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण देश की वर्तमान स्थिति है। राज्याधिकारियों में भ्रष्टाचार का दीमक लग जाने के कारण राष्ट्र का वातावरण दूषित हो रहा है। आज दुनिया के अधिकांश देशों में आपाधापी है। विश्वयुद्ध की आशंका के बादल गहराते जा रहे हैं। यह सब हिंसा मूलक नीति का ही नतीजा है। ऐसे हालात में दो राष्ट्रों में वास्तविक मित्रता कदापि नहीं हो सकती। चाहे वे दिखावे के लिए कितना ही ढोंग क्यों न कर लें। महात्मा गांधी ने गुजरात के एक जैन विचारक के उपदेशों से प्रभावित होकर महावीर स्वामी के अहिंसा तत्व दर्शन का गहन अध्ययन किया। बापू महावीर के विचारों से इतने गहरे प्रभावित हुए कि आजीवन उनके अनुयायी बने रहे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का आधार अहिंसा पर रखकर पूरे संसार के सम्मुख एक अनूठा आदर्श रखा। हम कह सकते हैं कि अपने अहिंसा मूलक आन्दोलन द्वारा उन्होंने महावीर के मूल सिद्धांत का महत्व जिस तरह दुनिया के सामने रखा वैसा कोई दूसरा अभी तक नहीं कर पाया है। महात्मा गांधी ने 1919 में एक सभा में भाषण देते हुए कहा कि था कि मैं विश्वास पूर्वक कहता हूं कि महावीर स्वामी का नाम इस समय यदि किसी सिद्धान्त के लिए पूजा जाता है तो वह अहिंसा ही है। मैंने अपनी शक्ति के अनुसार संसार के जिन अलग-अलग धर्मो का अध्ययन किया है और उनके जो सिद्धांत मुझे योग्य मालूम दिये, उनका आचरण भी मैं करता रहा हूं। मैं अपने को एक पक्का सनातनी हिन्दू मानता हूं, परन्तु मैं नहीं समझता कि जैन धर्म दूसरे दर्शनों की अपेक्षा हल्का है। ..मैं जानता हूं कि जो सच्चा हिन्दू है वह जैन है और जो सच्चा जैन है, वह हिन्दू है। प्रत्येक धर्म की उच्चता इसी बात में है कि उस धर्म में अहिंसा का तत्व कितने परिमाण में है और इस तत्व को यदि किसी ने अधिक से अधिक विकसित किया है तो वे महावीर स्वामी थे। महावीर स्वामी ने संसार में जीव की स्थिति और कर्मानुसार उसकी भली-बुरी गति के संदर्भ में गहन चिंतन के उपरान्त जिस जीवन पण्राली का प्रतिपादन किया वह जैन धर्म में बारह भावना के नाम से प्रसिद्ध है। ये बारह भावनाएं हैं-अनित्य भावना यानी इंद्रिय सुख क्षण भंगुर है। अतएव इस अनित्य जगत के लिए मैं उत्सुक नहीं होऊंगा। अशरण भावना अर्थात जिस प्रकार निर्जन वन में सिंह के पंजे में आये शिकार के लिए कोई शरण नहीं होती, उसी प्रकार सांसारिक प्राणियों की रोग व मृत्यु से रक्षा करने वाला कोई नहीं है। संसारानुप्रेक्षा भावना का अर्थ है अज्ञानी जन भोग विषयों को भी सुख मानते हैं, किन्तु ज्ञानी उनको नरक का निमित्त समझते हैं, इसलिए मानव को सत्कर्मो द्वारा पाप से छूटने का यत्न करना चाहिए। एकत्व भावना अर्थात प्राणी को जन्म के बाद अकेले ही संसार रूपी वन में भटकना होता है। अन्यत्व भावना का अर्थ है कि जगत में कोई भी संबंध स्थित नहीं है। माता-पिता, पत्नी व संतान भी अपने नहीं है। समस्त सांसारिक पदार्थ व्यक्ति से अलग है। अशुचि भावना का अर्थ है रुधिर, वीर्य आदि से उत्पन्न यह शरीर मल मूत्र आदि से भरा हुआ है। अत: इस पर गर्व करना अनुचित है। अस्तव भावना यानी जिस प्रकार छिद्र युक्त जहाज जल में डूब जाता है उसी प्रकार जीव भी कर्मो के अनुसार इस भव सागर में डूबता-उतराता रहता है। निर्जरा भावना का अर्थ है पूर्व कर्मो को तपस्या द्वारा क्षय करना ही योगियों का कर्त्तव्य है। इस तरह कुल बारह भावनाओं के परिमार्जन से जीवन को मोक्ष की दिशा देने वाले महावीर जी समाज का उद्धार कर सकने में समर्थ हो सके।
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