Friday, June 17, 2011
Wednesday, June 15, 2011
Friday, June 10, 2011
Saturday, June 4, 2011
क्या धर्म से दूर हो रही है दुनिया!
अपनी बर्बरता के लिए दुनिया भर में कुख्यात अमेरिकी सेना के अंदर इन दिनों चल रही एक अलग तरह की सरगर्मी की तरफ बहुत कम लोगों का ध्यान गया होगा। खबर के मुताबिक सेना के अंदर कार्यरत नास्तिकों के समूह को मान्यता दिलाने की कोशिशें इन दिनों अमेरिकी सेना के अंदर चर्चा का विषय है। विचारों से निरीश्वरवादी सार्जेट जस्टिन ग्रिफिथ, जो फोर्ट बै्रग स्थित अमेरिकी सेना के सबसे बड़े अड्डे पर तैनात हैं, इस मुहिम के सूत्रधार लोगों में हैं। दरअसल, इन लोगों ने सेना के अंदर एक समूह-मिलिटरी अथीइस्ट एंड सेक्युलर ह्यूमैनिस्ट यानी नास्तिक सैनिक और धर्मनिरपेक्ष मानवतावादी का निर्माण किया है। वे जानते हैं कि उनके समूह को मान्यता मिली तो वे न केवल सैनिक अड्डे पर अन्य आस्थावानों की तरह अपनी बैठकें कर सकते हैं, बल्कि अपनी बैठकों का प्रचार भी कर सकते हैं और समान विचार के लोगों को जोड़ सकते हैं। फिलहाल आधिकारिक स्वीकृति के अभाव में वह किसी के घर पर मिलकर चर्चा करते हैं। नास्तिकों के इस समूह में हाल ही में शामिल लेफ्टिनेंट सामंथा निकोल बताती हैं कि किस तरह ईसाई बहुल अमेरिकी सेना में नास्तिकों को अलग निगाह से एक अजूबे की तरह देखा जाता है। गौरतलब है फोर्ट ब्रैग की तरह बीस अन्य अमेरिकी सैनिक अड्डों पर भी ऐसे छोटे-बड़े समूह सक्रिय हैं जिन्हें सार्जेट ग्रिफिथ की कोशिशों के परवान चढ़ने का इंतजार है। अमेरिकी सेना के अंदर अपनी अलग पहचान स्थापित करने की नास्तिकों या सेक्युलर मानवतावादियों की जद्दोजहद की खबर की पृष्ठभूमि में यह जानना महत्वपूर्ण है कि खुद अमेरिका के अंदर इस संदर्भ में क्या स्थिति है? न्यूयार्क की सिटी यूनिवर्सिटी ने अमेरिकन रिलीजियस आइडेंटीफिकेशन सर्वेक्षण के जरिए अमेरिका में धर्म को न मानने वालों की संख्या के बारे में जानना चाहा था, जिसमें उनका विशेष जोर तीस साल से कम उम्र के अमेरिकियों की स्थिति को जानने पर था। जहां 24.5 प्रतिशत यानी 508.7 लाख लोग रोमन कैथोलिक धर्म को मानने वाले मिले। 16.3 प्रतिशत यानी 338.3 लाख लोग बैप्टिस्ट थे तो 14.1 फीसदी लोगों ने कहा कि वे धर्म को नहीं मानते हैं यानी नास्तिक हैं। इसके बाद 6.8 फीसदी यानी 141.9 लाख लोग ईसाई धर्म को (कोई संप्रदाय स्पष्ट नहीं किया) को मानने वाले थे तो 6.8 फीसदी यानी 141.9 लाख लोग मेथॉडिस्ट थे। इस पूरे मामले की गहराई में जाएं तो साफ दिखता है कि नास्तिकों की 35 फीसदी आबादी की उम्र 30 साल से कम की है। गौरतलब है कि अमेरिका के अनन्य सहयोगी ब्रिटेन में धर्म के प्रति लोगों का रुझान और तेजी से बदल रहा है। लंदन से प्रकाशित गार्डियन अखबार ने पिछले दिनों ब्रिटिश सोशल एटिट्यूड्स सर्वेक्षण के ताजा शोध को प्रकाशित किया था। मालूम हो कि इसके अंतर्गत हर साल यह पता किया जाता है कि ब्रिटेन में कितने लोग आस्तिक हैं। 1985 में जब पहली दफा यह सर्वेक्षण किया गया था तो 63 फीसदी लोगों ने कहा था कि वे क्रिश्चियन हैं, जबकि 34 फीसदी ने कहा था कि वे किसी भी धर्म में आस्था नहीं रखते। आज पूरी चौथाई सदी बाद प्राप्त सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि केवल 42 फीसदी ब्रिटेनवासियों ने कहा है कि उनकी धार्मिक आस्था है, जबकि 51 फीसदी ने कहा है कि उनका कोई धर्म नहीं है। बीता क्रिसमस ब्रिटेन के इतिहास का पहला अवसर था, जब उसकी बहुसंख्य आबादी ऐसी थी जो किसी भी धर्म में विश्र्वास नहीं रखती थी। ब्रिटेन के तीन प्रमुख राजनीतिक दलों में से दो का नेतृत्व नास्तिकों के हाथ में है और खुद प्रधानमंत्री भी स्वीकार करते हैं कि उनकी धार्मिक आस्था डांवाडोल रहती है। नार्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी का ताजा अध्ययन यह अनुमान लगाता है कि वह दिन दूर नहीं कि धर्म का नामोनिशान मिट जाएगा। विश्वविद्यालय स्थित अमेरिकन फिजिकल सोसाइटी ने नौ देशों के अध्ययन पर यह निष्कर्ष निकाला है। ये देश हैं आस्ट्रेलिया, कनाडा, चेक गणराज्य, फिनलैंड, आयरलैंड, नीदरलैंड्स, न्यूजीलैंड और स्विट्जरलैंड। नार्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी की उपरोक्त रिसर्च टीम ने इसे समझने के लिए एक गणितीय मॉडल का निर्माण किया ताकि विभिन्न धर्मावलंबियों और उसके पीछे अंतर्निहित सामाजिक प्रेरणाओं की पड़ताल की जा सके। वे जो उच्च गणित की जानकारी रखते हैं, समझ सकते हैं कि अलग-अलग कारकों से प्रभावित किसी व्यापक भौतिक घटना को समझने के लिए नान लीनियर डाइनामिक्स का प्रयोग होता है। इसी टीम के एक अन्य सदस्य डेनिअल अब्राहम्स ने वर्ष 2003 में इसी मॉडल का प्रयोग करके कम बोली जाने वाली भाषाओं के ह्रास या खात्मे का सांख्यिकीय आधार तलाशने की कोशिश की थी। उन्होंने दिखाया था कि कौन-सी भाषा टिकी रहेगी और कौन-सी भाषा विलुप्त होगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि संबंधित विशिष्ट भाषा बोलने की उपयोगिता कितनी है। उदाहरण के लिए अगर भाषा के संदर्भ में देखें तो पेरू की मृतप्राय केचुआन बोलने के बनिस्पत लोग स्पैनिश भाषा पसंद करेंगे और उसी तरह की स्थिति हम विशिष्ट धर्म के सदस्य होने या न होने के रूप में भी देख सकते हैं। रिसर्च टीम ने इसके लिए पिछले एक सौ साल के अंतराल का इन देशों की जनगणना का विवरण हासिल किया जिसमें धार्मिक प्रतिबद्धताओं का भी उल्लेख किया गया था। रिसर्च कारपोरेशन फॉर साइंस एडवांसमेंट के डॉक्टर रिचर्ड वीनर के मुताबिक बहुत से आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देशों में लोग खुद को धर्म से अलग करते जा रहे हैं। नीदरलैंड में जहां ऐसे लोगों की संख्या 40 फीसदी है तो चेक गणराज्य में 60 फीसदी लोगों ने किसी धर्म के प्रति प्रतिबद्धता नहीं दिखाई है। कोई यह पूछ सकता है कि पश्चिमी देशों की इन खबरों के बीच अपने देश की क्या स्थिति है? कुछ साल पहले एक अखबार ने देश के प्रमुख महानगरों में इसी तरह का सर्वेक्षण किया था, जिसमें उन्हें उत्तर एवं दक्षिण के बीच एक फर्क दिखाई दिया था। जहां सर्वेक्षण में शामिल उत्तर भारत के सहभागियों में से 92 फीसदी ने कहा था कि वे खुद पर यकीन करते हैं, वहीं दक्षिण के 86 फीसदी ने ईश्वर पर अपना यकीन जाहिर किया था। धर्म पर विश्वास रखने वाली आबादी की बड़ी संख्या के बावजूद दो बातें महत्वपूर्ण हैं जिसमें उत्तर के आठ फीसदी लोग एवं दक्षिण के 14 फीसदी लोगों ने ईश्वर पर अपना विश्वास व्यक्त नहीं किया। इसी तरह अन्य 43 फीसदी प्रतिभागियों ने धर्म को अपना निजी मामला मानने पर जोर दिया। अभी ज्यादा दिन नहीं बीता तमिलनाडु के तिरुचि में नास्तिकों का आठवां विश्वसम्मेलन हुआ था जिसमें विभिन्न देशों से लगभग 200 प्रतिनिधि पहुंचे थे। मालूम हो कि विजयवाड़ा स्थित अथीइस्ट सेंटर विगत लगभग चालीस सालों से ऐसे सम्मेलनों का आयोजन कर रहा है। प्रस्तुत सम्मेलन में यह तय किया गया कि मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती छद्म विज्ञान का बोलबाला है, जिसका मुकाबला करने में तर्कबुद्धि एवं नास्तिकता के प्रचार की आवश्यकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Sunday, May 22, 2011
ऐतिहासिक रामजानकी मंदिर पर संकट के बादल
बिहार के सरायरंजन स्थित शाहजहां कालीन ऐतिहासिक रामजानकी मंदिर में रौनक रहा करती थी। सैकड़ों भक्त रोज पूजा-अर्चना करने आते थे पर आज इस मंदिर पर संकट के बाद छाए हुए हैं। यहां के साधु-संत पलायन कर चुके हैं और मंदिर की 125 एकड़ जमीन पर अतिक्रमणकारियों का कब्जा है। ग्रामीण दुखी स्वर में कहते हैं कि नाथ ही अनाथ हो गए हैं। जिला मुख्यालय से 20 किमी दक्षिण नरघोघी गांव में रामजानकी मंदिर स्थित है। बताया जाता है कि तकरीबन 400 साल पहले ऋषिकेश के सिद्ध संत सर्वश्री रामलला दास शिष्यों के साथ पूर्वाचल के तीर्थाटन के क्रम में यहां ठहरे थे। तत्कालीन जिला प्रमुख ने उनका शिष्यत्व ग्रहण करने के साथ ही 700 एकड़ भूमि एवं 1000 अशर्फियां अर्पित की और जिले में ही रुकने का आग्रह किया था। इसके बाद सिद्ध संत के आदेश से नरघोघी गांव में श्री रामजानकी मंदिर का निर्माण किया गया। राम, सीता व हनुमान की प्रतिमाओं को रखने के लिए मंदिर में करीब 42 मन चांदी का सिंहासन भी बना। 1975 में 12वें महंत रामरक्षा दास के समय तक मंदिर के प्रांगण में दर्जनों हाथी-घोड़े और लाव-लश्कर मौजूद थे। विजयादशमी पर्व पर धूमधाम से भगवान की रथ यात्रा निकलती थी, लेकिन अब सबकुछ बीते दिनों की बात है। 13वें महंत शिवनारायण दास कहते हैं कि मंदिर की 375 एकड़ जमीन जमींदारी प्रथा के तहत ले ली गई। 100 एकड़ जमीन भूदान में चली गई। कुछ जमीन को पूर्व महंतों ने बेच दी। 125 एकड़ से अधिक जमीन पर अतिक्रणकारियों ने कब्जा जमा रखा है। 11 एकड़ में मंदिर बना हुआ है। इसके अलावा 15 एकड़ जमीन ही मंदिर के पास है। महंत के अनुसार अतिक्रमित जमीन को मुक्त कराने के लिए कई बार जिलाधिकारी को लिखा गया, लेकिन स्थिति यथावत है। प्रखंड बीस सूत्री कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रोफेसर विनोद वाजपेयी ने बताया कि अतिक्रमणकारियों के विरुद्ध धार्मिक न्यास बोर्ड को लिखा गया है। नरघोघी के विशेश्वर रजक व उदयपुर के नंद कुमार झा समेत दर्जनों ग्रामीण मंदिर की बदहाली से दुखी हैं। पूर्व विधायक संत रामाश्रय ईश्वर के अनुसार, सरकार को इस ऐतिहासिक महत्व के स्थल के संरक्षण व सुरक्षा के उपाय करने चाहिए। सरायरंजन के बीडीओ सुधीर कुमार ने कहा, मंदिर की प्राचीन गरिमा को लौटाने के लिए धार्मिक न्यास बोर्ड को लिखा जाएगा। इस बाबत स्थानीय विधायक व सूबे के जलसंसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी ने भी मंदिर के सुरक्षा व विकास को लेकर आश्र्वासन दिये, लेकिन सवाल यह है कि ये कब तक पूरे होंगे ?
Saturday, April 30, 2011
जनता की सेवा का चमत्कार
युग पुरुष सत्य साई बाबा का परलोकगमन करोड़ों आंखों को नम कर गया। वह सिर्फ चमत्कारी साधु नहीं थे, बल्कि उनका सम्मान इसलिए सबसे ज्यादा था, क्योंकि उन्होंने जनसेवा के इतने काम किए थे जो हर किसी के लिए एक उदाहरण है। गरीबों के लिए अच्छे अस्पताल, बड़े-बड़े विश्वविद्यालय, बेहतरीन कालेज, स्कूल और गांव की जनता के लिए पीने का पानी व सिंचाई की परियोजनाएं सत्य साई बाबा ने अपने ट्रस्ट से स्थापित की थीं। इस देश में धर्म से जुड़े अनेक लोग और संस्थाएं हैं, लेकिन बहुत कम हैं जो जनता के हित के लिए काम करते हैं। साई बाबा का यह चमत्कार सबको पता है कि वह हवा में हीरे की अंगूठी, हीरे का हार और भभूति निकाल देते थे। यह मैंने स्वयं पुट्टपर्थी और व्हाइट फील्ड के उनके आश्रमों में देखा है। वह स्वयं कहते थे कि इन चमत्कारों से किसी को प्रभावित नहीं होना चाहिए। यह सब छोटी बाते हैं। असली बात यह है कि जनता के हित के और दान पुण्य के आप कितने काम करते हैं। उनका जोर इन्हीं बातों पर ज्यादा रहता था। गोस्वामी तुलसीदास ने भी सारी बातें लिखने के बाद असली सार इसी बात में पाया और लिखा कि दूसरों के हित से बड़ा कोई धर्म नहीं। इसी तरह महात्मा गांधी सिर्फ भजन गाने के लिए अपनी सभा में नहीं बैठते थे, बल्कि उनके भजनों में संदेश थे। रघुपति राघव राजा राम में वह ईश्वर अल्ला तेरे नाम सबको सम्मति दे भगवान के जरिए पंथनिरपेक्षता और सामाजिक एकता का संदेश देते थे। उनका दूसरा भजन वैष्णव जन.. लोगों के दुख दर्द को अपना दुख दर्द मानकर मदद करने और दूसरे का उपकार करके कभी मन के अंदर घमंड न लाने का संदेश देता था। ऐसा नहीं है कि सत्य साई बाबा के अलावा बाकी सारे साधु-संत ठीक नहीं हैं। तमाम साधु-संत, मौलाना, पादरी बहुत अच्छा काम भी कर रहे हैं। उनकी संस्थाएं भारी संख्या में पैसा लोगों की शिक्षा और इलाज सहित तमाम दूसरी सेवाओं पर खर्च कर रही हैं, लेकिन दुर्भाग्य से सभी ऐसा नहीं कर रहे हैं। बड़ी संख्या में गलत लोग भी इनके वेश में जनता से पैसा ऐंठ रहे हैं। तमाम ऐसे लोग भोली-भाली महिलाओं को ठगते हैं। कई तांत्रिक तो ऐसे कार्य करते हैं कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इलाज के नाम पर महिलाओं और बच्चों को बेरहमी से पीटते हैं, भूत-प्रेत उतारने के नाम पर शारीरिक यातनाएं देते हैं। ऐसे लोगों को न धर्म या मजहब का ज्ञान होता है, न ही तंत्र विद्या का ज्ञान होता है। वे एक आडंबर बनाकर रखते हैं और उस आडंबर में लोग अंधी आस्था के कारण फंस जाते हैं। देश में पढ़े-लिखे लोगों के सामाजिक संगठनों को आगे आकर ऐसे धोखेबाज लोगों का पर्दाफाश करना चाहिए। मीडिया को भी ऐसे लोगों के खिलाफ एक मुहिम चलानी चाहिए। इस मामले में पाकिस्तान में तो बेहद गलत काम हो रहा है। वहां मजहब के नाम पर आतंकवाद के अड्डे चल रहे हैं। बहुत कम मौलाना ऐसे हैं जो सच में इस्लाम के रास्ते पर चल रहे हैं और इस्लाम का संदेश दे रहे हैं। ज्यादातर मौलाना इस्लाम के नाम पर तमाम जमात बना लेते हैं और उसमें लोगों से पैसे इकट्ठे करके हथियार और बम खरीदते हैं। हर मौलाना के साथ एके-47 लिए आतंकवादियों के गिरोह चलते हैं। नशीले पदार्थो के धंधे भी हो रहे हैं। इस्लाम और रूहानियत से इनका कोई ताल्लुक नहीं होता है, जो इनकी बात माने वह तो सच्चा मुस्लमान है और जो न माने उसे काफिर कहकर मार देते हैं। पाकिस्तान के एक मशहूर अखबार के मुताबिक इस तरह के मौलानाओं ने अब तक पिछले दस सालों में करीब छह लाख मुसलमानों को मारा है, हजारों बेगुनाह औरतों के या तो हाथ काट दिए या उनके मुंह पर तेजाब डलवाकर उन्हें बदशक्ल कर दिया। मस्जिदों के अंदर बम विस्फोट कर नमाज पढ़ रहे हजारों लोगों को मरवा दिया। सबसे दुख की बात यह है कि यह सब काम उन्होंने इस्लाम के नाम पर किया। आज पाकिस्तान में हालत यह है कि आम जनता मौलानाओं को श्रद्धा या सम्मान से नहीं देखती है। उनसे सिर्फ डरती है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में तो धार्मिक लोग पीछे से राजनीति में भी जमकर दखल देते हैं। लोग उनकी बातों से गुमराह हो जाते हैं। ऐसे लोगों की सच्चाई उजागर करनी चाहिए। सत्य साई बाबा तो अपनी देह छोड़कर चले गए, लेकिन उनके संदेश और उनका दिखाया हुआ रास्ता लोगों के सामने है। उनके बारे में तमाम विवाद भी समय-समय पर आते रहे, लेकिन इनसे वह रत्ती भर भी विचलित नहीं हुए। वह अपना काम उसी तरह करते रहे और अध्यात्म के मार्ग पर चलते रहे। उनके शिष्यों की बहुत बड़ी संख्या है। मुझे उम्मीद है कि वे सब उसी तरह उनके बताए रास्ते पर चलते रहेंगे और आपस में लड़ने झगड़ने का काम नहीं करेंगे। (लेखक कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य हैं).
Friday, April 29, 2011
Monday, April 25, 2011
अध्यात्म और समाज सेवा
आंध्र प्रदेश के पुट्टापर्थी का नाम आज पूरे देश की जुबान पर न चढ़ा होता अगर सत्य साईं बाबा ने वहां जन्म न लिया होता। उनके देहावसान के बाद अब उनके 60 लाख से भी ज्यादा भक्तों को बाबा के एक और अवतार का इंतजार है। उन्हें उम्मीद है कि वे जल्द ही बाबा को प्रेमा साईं बाबा के नए अवतार में देखेंगे। सत्य साईं ने भविष्यवाणी की थी कि वे 96 साल तक जिंदा रहेंगे और फिर वर्ष 2023 में कर्नाटक के मंड्या जिले के गुणापर्थी गांव में प्रेमा साईं के रूप में नया अवतार लेंगे। यह साईं का अंतिम अवतार होगा। स्पष्ट है कि एक अवतार किसी भी छोटे या बड़े स्थान की किस्मत तो सुधार ही सकता है। प्रेमा साईं अवतार का जिक्र उन्होंने पहली बार वर्ष 1963 में एक प्रवचन के दौरान किया था। उन्होंने भगवान शिव के एक वादे का हवाला देते हुए कहा था कि शिव और शक्ति भारद्वाज गोत्र में तीन बार जन्म लेंगे। वर्ष 2008 में भी उन्होंने कहा था कि प्रेमा साईं के अवतरित होने से मानव मात्र में जबरदस्त एकता आएगी। प्रेमा साईं का शरीर बनने की प्रक्रिया शुरू होने की बात उन्होंने कही थी और यह भी बताया था कि प्रेमा साईं का जन्म कस्तूरी के गर्भ से होगा। यह सारी बातें शायद कुछ लोगों को अटपटी लगें और साईं भक्तों की मान्यताओं को नकारने की कवायद शुरू हो जाए लेकिन ध्यान रखना होगा कि सत्य साईं विशुद्घ सनातन धर्म के प्रचार का दावा किया करते थे। चूंकि सनातन धर्म पुनर्जन्म के सिद्घांत का दमदार प्रयोग करता है इसलिए सत्य साईं के दावों पर अति प्रतिक्रिया नहीं जताई जानी चाहिए। वैसे, साईं ने अपने जीते-जी किसी भी अति प्रतिक्रिया में खास विश्वास नहीं जताया। उनके खिलाफ कई प्रकार के आरोप लगाए गए लेकिन उन आरोपों का असर उनकी सेहत पर कभी नहीं पड़ा। कम-से-कम यह तो साफ देखा जा सकता है कि उन्होंने आज के स्वयंभू संत-महंतों की तरह अराजक व्यवहार कभी नहीं किया। अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले तक भी वे नियमित रूप से अध्यात्म और संस्कार प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन करते रहे। साथ ही, समाजसेवा की उनकी शानदार कोशिश के रूप में उन्होंने पुट्टापर्थी में जो अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस अस्पताल स्थापित किया था, वह भी पूरी तरह से सक्रिय रहा है। धर्मी, अधर्मी और विधर्मी में भेद किए बगैर यह अस्पताल वाकई मानवता की सेवा में लगातार काम करता रहा है। आज भारत के सिवा अन्य किसी भी देश में समूचे समाज के लिए ऐसी व्यक्तिगत पहल देखने को नहीं मिलती। अध्यात्म और समाजसेवा के माध्यम से सत्य साईं सनातन धर्म की वाकई सच्ची सेवा की है।आंध्र प्रदेश के पुट्टापर्थी का नाम आज पूरे देश की जुबान पर न चढ़ा होता अगर सत्य साईं बाबा ने वहां जन्म न लिया होता। उनके देहावसान के बाद अब उनके 60 लाख से भी ज्यादा भक्तों को बाबा के एक और अवतार का इंतजार है। उन्हें उम्मीद है कि वे जल्द ही बाबा को प्रेमा साईं बाबा के नए अवतार में देखेंगे। सत्य साईं ने भविष्यवाणी की थी कि वे 96 साल तक जिंदा रहेंगे और फिर वर्ष 2023 में कर्नाटक के मंड्या जिले के गुणापर्थी गांव में प्रेमा साईं के रूप में नया अवतार लेंगे। यह साईं का अंतिम अवतार होगा। स्पष्ट है कि एक अवतार किसी भी छोटे या बड़े स्थान की किस्मत तो सुधार ही सकता है। प्रेमा साईं अवतार का जिक्र उन्होंने पहली बार वर्ष 1963 में एक प्रवचन के दौरान किया था। उन्होंने भगवान शिव के एक वादे का हवाला देते हुए कहा था कि शिव और शक्ति भारद्वाज गोत्र में तीन बार जन्म लेंगे। वर्ष 2008 में भी उन्होंने कहा था कि प्रेमा साईं के अवतरित होने से मानव मात्र में जबरदस्त एकता आएगी। प्रेमा साईं का शरीर बनने की प्रक्रिया शुरू होने की बात उन्होंने कही थी और यह भी बताया था कि प्रेमा साईं का जन्म कस्तूरी के गर्भ से होगा। यह सारी बातें शायद कुछ लोगों को अटपटी लगें और साईं भक्तों की मान्यताओं को नकारने की कवायद शुरू हो जाए लेकिन ध्यान रखना होगा कि सत्य साईं विशुद्घ सनातन धर्म के प्रचार का दावा किया करते थे। चूंकि सनातन धर्म पुनर्जन्म के सिद्घांत का दमदार प्रयोग करता है इसलिए सत्य साईं के दावों पर अति प्रतिक्रिया नहीं जताई जानी चाहिए। वैसे, साईं ने अपने जीते-जी किसी भी अति प्रतिक्रिया में खास विश्वास नहीं जताया। उनके खिलाफ कई प्रकार के आरोप लगाए गए लेकिन उन आरोपों का असर उनकी सेहत पर कभी नहीं पड़ा। कम-से-कम यह तो साफ देखा जा सकता है कि उन्होंने आज के स्वयंभू संत-महंतों की तरह अराजक व्यवहार कभी नहीं किया। अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले तक भी वे नियमित रूप से अध्यात्म और संस्कार प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन करते रहे। साथ ही, समाजसेवा की उनकी शानदार कोशिश के रूप में उन्होंने पुट्टापर्थी में जो अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस अस्पताल स्थापित किया था, वह भी पूरी तरह से सक्रिय रहा है। धर्मी, अधर्मी और विधर्मी में भेद किए बगैर यह अस्पताल वाकई मानवता की सेवा में लगातार काम करता रहा है। आज भारत के सिवा अन्य किसी भी देश में समूचे समाज के लिए ऐसी व्यक्तिगत पहल देखने को नहीं मिलती। अध्यात्म और समाजसेवा के माध्यम से सत्य साईं सनातन धर्म की वाकई सच्ची सेवा की है।
Friday, April 22, 2011
Monday, April 18, 2011
Saturday, April 16, 2011
जियो और जीने दो के प्रणोता महावीर
अनेकता में एकता भारतभूमि की धर्मप्राण संस्कृति की अनूठी विशेषता है। समय-समय पर देशकाल की परिस्थितियों के अनुरूप यहां कई दिव्य सत्ताएं अवतरित हुईं, जिन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त अवांछनीयता का निराकरण कर समाज को नयी व सार्थक दिशा दी। महावीर स्वामी ऐसी ही अवतारी सत्ता थे। 540 ई.पूर्व कुण्ड ग्राम (वर्तमान बिहार) के एक राजघराने में जन्मे क्षत्रिय राजकुमार वर्धमान के हृदय में समाज की वर्तमान दशा-दिशा को देखकर वेदना के अंकुर बाल्यावस्था से ही फूटने लगे थे, परन्तु पारिवारिक दायित्वों के कारण उन्हें इस दिशा में कुछ सार्थक करने का मौका 30 वर्ष की आयु में मिल पाया। जीवन उद्देश्य की प्राप्ति का सुअवसर मिलते ही उन्होंने एक पल की देरी नहीं की। गृहत्याग कर 12 वर्षो तक कठोर तप साधना के बाद कैवल्य (परमज्ञान) की प्राप्ति के बाद वह जैन धर्म के 24 वें तीर्थकर महावीर स्वामी के रूप में प्रतिष्ठित हुए। अहिंसा परमो धर्म: के प्रवर्तक के रूप में महावीर स्वामी की शिक्षाएं वर्तमान में कहीं अधिक प्रासंगिक और अनुकरणीय हैं। महावीर द्वारा अपने प्रत्येक अनुयायी (साधु व गृहस्थ दोनों वर्गो के लिए) के लिए अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मर्चय व अपरिग्रह इन पांच व्रतों का पालन अनिवार्य बताया गया है, परन्तु इन सभी में अहिंसा की भावना प्रमुख है। उनकी मान्यता है कि मानव व दानव में केवल अहिंसा का ही अंतर है। जब से मानव ने अहिंसा को भुलाया तभी से वह दानव होता जा रहा है और उसकी दानवी वृत्ति का अभिशाप आज समस्त विश्व भोगने को विवश है। संसार के प्रत्येक जीव को अपना जीवन अति प्रिय है। जो उसको नष्ट करने को उसको क्षति पहुंचाने को उद्यत रहता वह हिंसक है, दानव है। इसके विपरीत जो उसकी रक्षा करता है वह अहिंसक है और वही मानव है। यद्यपि कालान्तर में जैन धर्म के सिद्धान्तों का अक्षरश: पालन करना लोगों के लिए कठिन होने लगा फिर भी इसमें संदेह नहीं है कि महावीर स्वामी ने अपने समय में जिस अहिंसा के सिद्धांत का प्रतिपादन किया वह निर्बलता व कायरता उत्पन्न करने के बजाय राष्ट्र में शांति व अमन स्थापित करने के उद्देश्य से किया। उन्होंने तत्कालीन हिन्दू धर्म को दूषित बनाने वाली पशु बलि जैसी कुप्रथा को रोककर सामाजिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया। उनका कहना था कि पशु हत्या ही नहीं, स्वार्थपरता, बेईमानी व धोखेबाजी भी हिंसा का ही रूप है। उन्होंने समाज को जियो और जीने दो का सूत्र दिया। उन्होंने लोगों से कहा कि तुम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जो तुम दूसरों से अपने लिए चाहते हो। महावीर ने व्यक्ति के आचरण सुधार व उसे त्यागमूलक बनाने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि शासन व्यवस्था को भी अहिंसक होना चाहिए। शासन व्यवस्था में अनीति का प्रवेश हो जाने से राष्ट्र का नैतिक जीवन भ्रष्ट हो जाता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण देश की वर्तमान स्थिति है। राज्याधिकारियों में भ्रष्टाचार का दीमक लग जाने के कारण राष्ट्र का वातावरण दूषित हो रहा है। आज दुनिया के अधिकांश देशों में आपाधापी है। विश्वयुद्ध की आशंका के बादल गहराते जा रहे हैं। यह सब हिंसा मूलक नीति का ही नतीजा है। ऐसे हालात में दो राष्ट्रों में वास्तविक मित्रता कदापि नहीं हो सकती। चाहे वे दिखावे के लिए कितना ही ढोंग क्यों न कर लें। महात्मा गांधी ने गुजरात के एक जैन विचारक के उपदेशों से प्रभावित होकर महावीर स्वामी के अहिंसा तत्व दर्शन का गहन अध्ययन किया। बापू महावीर के विचारों से इतने गहरे प्रभावित हुए कि आजीवन उनके अनुयायी बने रहे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का आधार अहिंसा पर रखकर पूरे संसार के सम्मुख एक अनूठा आदर्श रखा। हम कह सकते हैं कि अपने अहिंसा मूलक आन्दोलन द्वारा उन्होंने महावीर के मूल सिद्धांत का महत्व जिस तरह दुनिया के सामने रखा वैसा कोई दूसरा अभी तक नहीं कर पाया है। महात्मा गांधी ने 1919 में एक सभा में भाषण देते हुए कहा कि था कि मैं विश्वास पूर्वक कहता हूं कि महावीर स्वामी का नाम इस समय यदि किसी सिद्धान्त के लिए पूजा जाता है तो वह अहिंसा ही है। मैंने अपनी शक्ति के अनुसार संसार के जिन अलग-अलग धर्मो का अध्ययन किया है और उनके जो सिद्धांत मुझे योग्य मालूम दिये, उनका आचरण भी मैं करता रहा हूं। मैं अपने को एक पक्का सनातनी हिन्दू मानता हूं, परन्तु मैं नहीं समझता कि जैन धर्म दूसरे दर्शनों की अपेक्षा हल्का है। ..मैं जानता हूं कि जो सच्चा हिन्दू है वह जैन है और जो सच्चा जैन है, वह हिन्दू है। प्रत्येक धर्म की उच्चता इसी बात में है कि उस धर्म में अहिंसा का तत्व कितने परिमाण में है और इस तत्व को यदि किसी ने अधिक से अधिक विकसित किया है तो वे महावीर स्वामी थे। महावीर स्वामी ने संसार में जीव की स्थिति और कर्मानुसार उसकी भली-बुरी गति के संदर्भ में गहन चिंतन के उपरान्त जिस जीवन पण्राली का प्रतिपादन किया वह जैन धर्म में बारह भावना के नाम से प्रसिद्ध है। ये बारह भावनाएं हैं-अनित्य भावना यानी इंद्रिय सुख क्षण भंगुर है। अतएव इस अनित्य जगत के लिए मैं उत्सुक नहीं होऊंगा। अशरण भावना अर्थात जिस प्रकार निर्जन वन में सिंह के पंजे में आये शिकार के लिए कोई शरण नहीं होती, उसी प्रकार सांसारिक प्राणियों की रोग व मृत्यु से रक्षा करने वाला कोई नहीं है। संसारानुप्रेक्षा भावना का अर्थ है अज्ञानी जन भोग विषयों को भी सुख मानते हैं, किन्तु ज्ञानी उनको नरक का निमित्त समझते हैं, इसलिए मानव को सत्कर्मो द्वारा पाप से छूटने का यत्न करना चाहिए। एकत्व भावना अर्थात प्राणी को जन्म के बाद अकेले ही संसार रूपी वन में भटकना होता है। अन्यत्व भावना का अर्थ है कि जगत में कोई भी संबंध स्थित नहीं है। माता-पिता, पत्नी व संतान भी अपने नहीं है। समस्त सांसारिक पदार्थ व्यक्ति से अलग है। अशुचि भावना का अर्थ है रुधिर, वीर्य आदि से उत्पन्न यह शरीर मल मूत्र आदि से भरा हुआ है। अत: इस पर गर्व करना अनुचित है। अस्तव भावना यानी जिस प्रकार छिद्र युक्त जहाज जल में डूब जाता है उसी प्रकार जीव भी कर्मो के अनुसार इस भव सागर में डूबता-उतराता रहता है। निर्जरा भावना का अर्थ है पूर्व कर्मो को तपस्या द्वारा क्षय करना ही योगियों का कर्त्तव्य है। इस तरह कुल बारह भावनाओं के परिमार्जन से जीवन को मोक्ष की दिशा देने वाले महावीर जी समाज का उद्धार कर सकने में समर्थ हो सके।
Wednesday, April 13, 2011
Saturday, April 9, 2011
Friday, April 8, 2011
प्रकृति संरक्षण का पर्व
हर वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नव संवत्सर के साथ ही देश में वासन्तिक नवरात्र का पूजा महोत्सव भी धूमधाम से प्रारम्भ हो जाता है। शक्ति पूजन की यह परम्परा नवरात्र के अवसर पर इतना व्यापक रूप धारण कर लेती है कि उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी और पश्चिम में राजस्थान से लेकर पूर्व में गुवाहाटी तक जितने भी ग्राम, नगर और प्रान्त हैं, सब अपनी अपनी आस्थाओं और पूजा शैलियों के अनुसार लाखों-करोड़ों दुर्गाओं की सृष्टि कर डालते हैं। शक्तिसंगमतन्त्र में नवरात्र की परिभाषा करते हुए कहा गया है कि नवरात्र नवशक्तियों के सायुज्य का पर्व है जिसकी एक-एक तिथि में एक-एक शक्ति प्रतिष्ठित हैन वशक्तिभि: संयुक्तं नवरात्रं तदुच्यते/एकैव देव देवेशि!
नवध परितिष्ठिता। मार्कण्डेयपुराण के अनुसार नवरात्र में जिन नौ देवियों की पूजा अर्चना की जाती है उनके नाम हैं- शैलपुत्री, ब्रrाचारिणी, चन्द्रघंटा, कूष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। पर्यावरण संतुलन की दृष्टि से हिमालय की प्रधान भूमिका है। यह पर्वत मौसम नियन्ता होने के साथ देश को राजनैतिक सुरक्षा व आर्थिक संसाधन भी मुहैया करता है। ग्लोबल वार्मिग के कारण ग्लेशियर पिघलने से पर्यावरण संकट का खतरा सबसे पहले हिमालय को ही झेलना पड़ता है इसलिए देवी के नौ रूपों में हिमालय प्रकृति को शैलपुत्री रूप में सर्वप्रथम स्थान दिया गया है। दुर्गासप्तशती के अनुसार शुम्भ, निशुम्भ आदि राक्षसों ने सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु को अपने नियंतण्रमें कर ब्रrांड की प्राकृतिक व्यवस्था असंतुलित कर दी था। तब पर्यावरण संकट से बचाने के लिए देवताओं और ऋषि- मुनियों को हिमालय जाकर जगदम्बा से प्रार्थना करनी पड़ी कि नमो देव्यौ महादेव्यै शिवायै सततं नम:/नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता स्म ताम्। अर्थात हे लोक कल्याणी प्रकृति देवी! हम सब तुम्हारी शरण में हैं, हमारी रक्षा करो। चिन्ता का विषय है कि इस वर्ष चार अपैल को पूरा देश जब प्रथम नवरात्र के दिन श्रद्धा से शैलपुत्री की समाराधना कर रहा था तो देवी ने कंपित होकर 5.7 रिक्टर पैमाने के भूकम्प द्वारा दिल्ली, उत्तराखंड सहित समूचे हिमालय में हडकम्प पैदा कर पर्यावरण को हानि पहुंचाने वालों को संकेत दे दिया कि शैलपुत्री के रूप में विख्यात हिमालय की प्रकृति आज तनावग्रस्त है। केन्द्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारत-नेपाल सीमा पर आये इस भूकम्प से पहले दो अप्रैल को कश्मीर जिनजियांग सीमा क्षेत्र में 4.9 और एक अप्रैल को हिन्दुकुश क्षेत्र में 5.2 रिक्टर का भूकम्प एशिया महाद्वीप के लिए खतरे के पूर्व संकेत हैं। इसलिए हिमालय प्रकृति के संरक्षण की चिन्ता नवरात्र में और भी प्रासंगिक हो गई है। प्रकृति क्या है? प्रकृति प्रकोप क्यों उभरते हैं? और उनसे मुक्ति का उपाय क्या है? इन शाश्वत प्रश्नों का मानव अस्तित्व से गहरा संबंध है। आधुनिक विज्ञान के पास इनका कोई उत्तर नहीं। विज्ञान स्वयं में जड़ है इसलिए वह प्रकृति को भी जड़बुद्धि से देखता है। पर सचाई यह है कि प्रकृति जब तबाही पर उतर आती है तो वह परमाणु सम्पन्न शहरों को भी कैसे लील जाती है, इसका ताजा उदाहरण जापान में आये भूकम्प और सुनामी की तांडव लीला है। प्रकृति वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि प्रकृति के साथ अंध विकासवादी विज्ञान यदि छेड़छाड़ करेगा तो प्रकृति महाकाली का रूप धारण कर उसे काबू में लाना भी जानती है। आज समूचे विश्व में विकासवाद के नाम पर ग्लोबल वार्मिग फैलाने वाले धूमल्रोचनों ने प्रकृति को कुपित कर दिया है। मधु-कैटभी अंधविकासवाद के तेवर उसे दासी बनाकर रखना चाहते हैं तो शुम्भ-निशुम्भ की आसुरी शक्तियां महामाया प्रकृति की सुन्दरता से मोहित हो उसके साथ गान्धर्व विवाह रचाना चाहती हैं। उधर विश्व संरक्षिका जगदम्बा ने भी पर्यावरण विरोध्ी असुरों को चुनौती दी है कि जो देवासुर संग्राम में शक्तिशाली बन उसे जीत लेगा वही उसका स्वामी होगा- यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्प व्यपोहति/यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति। दरअसल, प्रकृति-पूजा का विचारतंत्र नवरात्र में एक राष्ट्रीय महोत्सव जैसा रूप इसलिए धारण कर लेता है ताकि पर्यावरण संरक्षण की भारतीय परम्परा को चिरन्तन रूप दिया जा सके। इसे शक्तिपूजा के पौराणिक आख्यान के साथ इसलिए जोड़ा गया है ताकि पर्यावरण संचेतना का यह वाष्íिक उत्सव व्यक्ति, समाज और राष्ट्र तीनों स्तरों पर उपयोगी हो सके। इसी प्रयोजन से दुर्गासप्तशती में विश्व पर्यावरण की पीड़ा दूर करने के लिए समस्त प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा करने वाली नवदुर्गा का आह्वान है। परन्तु चिंता यह भी है कि उपभोक्तावादी जीवन मूल्यों ने शक्तिपूजा को मात्र धमक पूजा अनुष्ठान तक सीमित कर दिया है। पर्यावरण विज्ञान की पश्चिमी दृष्टि भी प्रकृति को मातृभाव से सम्मान देने के बजाय उपभोक्तावादी नजरिए से मूल्यांकित करती है। यही कारण है कि उपभोक्तावाद तथा विकासवाद के आक्रमण से आज प्रकृति तनाव के दौर से गुजर रही है। उसके दुष्परिणामों से मानव को बचाने का कोई रास्ता आधुनिक पश्चिमी पर्यावरणविज्ञान के पास नहीं है। मैसोपोटामिया, हड़प्पा, तथा महाभारतयुगीन उन्नत तथा विकसित सभ्यताएं केवल इसलिए नष्ट हो गई क्योंकि प्रकृति-प्रकोपों से बचने का कोई उपाय उनके पास नहीं बचा था। भारत के प्रकृति उपासकों का पूरी दुनिया को संदेश है कि वर्ष में दो बार आने वाले नवरात्र को प्रकृति पूजा अथवा पर्यावरण संरक्षण के पखवाड़े के रूप में मनाया जाए।
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