Sunday, February 20, 2011

गर्जिया देवी मंदिर


देवी भक्तों की सिर्फ सच्चे मन की श्रद्धा से ही प्रसन्न हो जाती हैं। यहां देवी मां पर जटा नारियल, लाल वस्त्र, सिंदूर, धूप, दीप आदि चढ़ावा चढ़ता है। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु घंटी या छतरी चढ़ाते हैं। नव विवाहित स्त्रियां यहां आकर अटल सुहाग की कामना करती है
रामनगर, उत्तराखंड से 10 किमी दूरी पर गर्जिया नाम की जगह है, जहां भगवान शिव की अर्धागिनी गिरिजा देवी का मंदिर है। गिरिराज हिमालय की पुत्री होने के कारण उन्हें इसी नाम से बुलाया जाता है। उत्तराखंड स्थित इस मंदिर का सही तरीके से निर्माण 1970 में किया गया। कहते हैं, गर्जिया नामक यह तीर्थ स्थल 1940 से पहले उपेक्षित अवस्था में था। वहां के निवासियों के अनुसार, 1940 साल से पहले यह क्षेत्र घने जंगलों से भरा पड़ा था। सबसे पहले वहां के निवासी वहां के टीले पर इन मूर्तियों को देखा और इस स्थान पर उन्हें माता रानी की उपस्थिति का अहसास हुआ। वहां के लोगों की धारणा है कि वर्तमान में गर्जिया मंदिर जिस टीले पर स्थित है, वह कोसी नदी की बाढ़ में कहीं ऊपरी क्षेत्र से बहकर आ रहा था। मूर्तियों को टीले के साथ बहते हुए आता देख भैरव ने उसे रोकने का प्रयास किया और कहा, ‘ठहरो बहना ठहरो, यहां पर मेरे साथ निवास करो। तभी से गर्जिया में देवी उपटा में निवास कर रही है। बहुत पहले गिरिजा देवी को उपटा देवी के नाम से भी जाना जाता था। इस मंदिर में मां गिरिजा देवी अपनी बहुत सारी महिमाओं के लिए प्रसिद्ध है। कहते हैं कि यहां देवी भक्तों की सिर्फ सच्चे मन की श्रद्धा से ही प्रसन्न हो जाती हैं। यहां देवी मां पर जटा नारियल, लाल वस्त्र, सिंदूर, धूप, दीप आदि चढ़ावा चढ़ता है। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु घंटी या छतरी चढ़ाते हैं। नव विवाहित स्त्रियां यहां आकर अटल सुहाग की कामना करती हैं। नि:संतान दं पत्ति संतान प्राप्ति के लिए माता रानी के समक्ष झोली फैलाते हैं। गर्जिया मंदिर के साथ-साथ यहां सरस्वती, गणोशजी तथा बटुक भैरव की संगमरमर की मूर्तियां भी शामिल हैं। सभी मंदिर में स्थापित मूर्ति यहीं पर खुदाई के दौरान मिली थी। यहां के पूजा के नियम के अनुसार माता गिरिजा की पूजा करने के बाद बाबा भैरव को भी चावल और उड़द की दाल चढ़ाकर पूजा-अर्चना करना आवश्यक माना जाता है। कहा जाता है कि भैरव की पूजा के बाद ही मां गिरिजा देवी की पूजा का संपूर्ण फल प्राप्त होता है। वैसे तो पूरे साल माता गिरिजा देवी की पूजा के लिए श्रद्धालुओं के भीड़ लगी रहती है मगर वसंत पंचमी में काफी संख्या में दर्शनार्थी यहां आते हैं। कार्तिक पूर्णिमा को गंगा स्नान के पावन पर्व के मौके पर माता गिरिजा देवी के दर्शन एवं पतित पावनी कोसी नदी में स्नान करने के लिए भारी संख्या में यहां भीड़ उमड़ती है। इसके साथ ही गंगा दशहरा, नवरात्र, शिवरात्रि, उत्तरायणी में भी बहुत भीड़ होती है और मेला भी लगता है।


मन का अहंकार


Thursday, February 17, 2011

‘बेगमपुरा शहर को नाव, दुख अंदोह नहीं तह ठांव’ के लिए जंग जारी है


सीर हो गया रविदास का बे-गम पुरा
बेगमपुरा...संत रविदास से जुड़ी किसी जगह का नाम नहीं, बल्कि उनकी परिकल्पना है। एक ऐसे शहर की परिकल्पना जिसमें गम के लिए कोई स्थान नहीं। वहां रहने वाले सिर्फ परमात्मा का स्मरण करने में तल्लीन हों। संतश्री की इस परिकल्पना को यथार्थ रूप प्रदान करने के लिए भले ही सामाजिक जंग जारी है, लेकिन उनकी जन्म स्थली सीर गोवर्धन पुर में कुछ समय के लिए बे-गम पुरा साकार हो गया है। जालंधर समेत पंजाब के तमाम स्थानों से पहुंच रहे श्रद्धालु काशी के इस दक्षिणी छोर को बेगमपुरा कहने लगे हैं। मान्यता है कि संत रविदास का जन्म यहीं हुआ था।
संत रविदास जयंती उत्सव के निमित्त शहर के सीरगोवर्धन क्षेत्र में जुटे लाखों भक्त अपने तमाम गम भुलाकर सिर्फ परमात्मा का स्मरण कर रहे हैं। जो जिस काम में लगा है, उसी के जरिए प्रभु स्मरण में मगन है। एक दर्जन से अधिक सांझा चूल्हों पर रोटी बनाती महिलाओं का समूह हो, चाहे सब्जी के लिए आलू और मटर छीलती महिलाओं का समूह। रोटियां बनाने और सब्जियां काटने-छीलने के दौरान संत रविदास के भजन उनके अधरों पर नर्तन कर रहे हैं। सुरक्षा से लेकर सेवा तक के विभिन्न कार्यों में लगे स्वयंसेवकों की आंखों की चमक यह सोचकर बढ़ जा रही है कि वे प्रभु के भक्तों की सेवा कर रहे हैं। शानो शौकत और ठाठबाट से रहने वाले लोग घर, कारोबार, नौकरी, बीमारी हर ओर से ध्यान हटा कर संत रैदास के उस दोहे के मर्म को जी रहे हैं जिसमें उन्होंने अपनी परिकल्पना का चित्रण किया है। बेगमपुरा शहर को नाव, दुख अंदोह नहीं तह ठांवअर्थात मैं एक ऐसा शहर बसाना चाहता हूं जिसका नाम बेगमपुरा हो। वहां के निवासी बे-गम हों। वहां दुख और अज्ञानता को कोई स्थान न मिले। इस दोहे के मर्म को हकीकत में बदलने के लिए संगीत का सहारा भी लिया जा रहा है। जंग जारी हैनाम से तैयार म्यूजिक एलबम मंदिर के आसपास की दुकानों पर बिक रहे हैं।

Friday, February 11, 2011

उत्तरकाशी का सूर्य मंदिर नष्ट होने की कगार पर


उत्तरकाशी देवभूमि में धार्मिक व पौराणिक महत्व के कई अवशेष बिखरे पड़े हैं। इनमें से कई अवशेष उत्तराखंड के इतिहास की और परतें खोल सकते हैं। संरक्षण न होने से ऐसे मंदिर समय के साथ अपना अस्तित्व खो रहे हैं। उत्तरकाशी जिले में रैथल व भटवाड़ी के बीच सूर्य मंदिर समूह ऐसा ही अवशेष है, जो अब नष्ट होने की कगार पर है। इस का उल्लेख अंग्रेज खोजकर्ता जेम्स विलियम फ्रेजर के यात्रा वृतांत में भी मिलता है। उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से करीब 42 किमी दूर भटवाड़ी व रैथल गांव के बीच खेतों में पौराणिक सूर्य मंदिर समूह के दो मंदिर हैं। इनको लेकर स्थानीय लोगों में इतनी ही जानकारी है कि कभी इसके आसपास और भी मंदिरों के अवशेष हुआ करते थे। उनमें मूर्तियां व विभिन्न प्रकार के नक्काशीदार पत्थर थे, लेकिन समय के साथ वह चोरी हो गई और अन्य मंदिरों के अवशेष भी नष्ट होते चले गए। जबकि ऐतिहासिक साक्ष्यों के मुताबिक यह मंदिर नौवीं सदी का बना हुआ है। रैथल के निकट सूर्य मंदिर समूह का उल्लेख 1816 में गंगा के उद्गम की खोज में निकले अंग्रेज खोजकर्ता जेम्स विलियम फ्रेजर के यात्रा वृतांत में मिलता है। हालांकि, गंगोत्री तक की उनकी यात्रा पूरी नहीं हो सकी थी, लेकिन अपने यात्रा रूट में पड़ने वाले मंदिर समूहों व धार्मिक स्थलों का वर्णन उन्होंने विस्तार से किया है। पांच वर्ष पूर्व पुरातत्व विभाग ने पौराणिक मंदिरों के निकट एक कंक्रीट का मंदिर तैयार करने के साथ ही एक बोर्ड टांग कर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर दी। उसके बाद विभाग ने इन मंदिरों की देखरेख को लेकर कोई कदम नहीं उठाया। इतिहास के जानकार उमारमण सेमवाल बताते हैं कि नवीं सदी की इस धरोहर का उल्लेख इतिहास की पुस्तकों में मिलता है। गंगोत्री धाम यात्रा मार्ग में ऐसे मंदिरों की बहुलता रही है, जो 1803 में आए भूकंप में नष्ट हुए थे। इसके बाद संरक्षण न मिलने से नष्ट होते जा रहे हैं। उत्तरकाशी के विश्वनाथ मंदिर के महंत अजय पुरी ने बताया कि पहले यह मंदिर समूह टिहरी व उत्तरकाशी के अन्य मंदिरों की तरह रियासत काल में बने टैंपल बोर्ड के ही संरक्षण में था। पांच वर्ष पहले ही इसकी जर्जर स्थिति को देखते हुए पुरातत्व विभाग ने इसे अपने अधीन कर लिया।


Thursday, February 3, 2011

संगठित पंथांतरण ही विश्वशांति में बाधक


यह विस्तारकारी प्रवृत्ति ही अनेक देशों के भीतर टकराव की स्थिति पैदा कर रही है और विश्वशांति को खतरे में डाल रही है। जब तक संगठित पंथ पंथातरण की विचारधारा का परित्याग नहीं करते और आत्मशो धन नहीं करते, तब तक पंथों के बीच संवाद का कोई परिणाम नहीं निकलेगा। कितनी विचित्र स्थिति है कि पूरे विश्व में दोनों विस्तारवादी पंथ-इस्लाम व ईसाई आमने-सामने खड़े हैं पर भारत में अल्पसंख्यकवादके आवरण में बहुसंख्यक हिन्दू समाज के विरुद्ध एक जुट हो गए हैं। इस स्थिति से बाहर निकलने का एक ही मार्ग है कि संयुक्त राष्ट्र पंथांतरण के संगठित प्रयासों को व्यक्ति स्वातंत्र्य पर आघात व अपराध घोषित करें
सयुक्त राष्ट्र संघ का विभिन्न उपासना पंथों के बीच संवाद एवं सौहार्द की प्रक्रिया आरम्भ करने का आह्वान स्वागत योग्य है। किन्तु अब से लगभग बीस वर्ष पूर्व अमेरिकी विचारक सेमुअल हंटिंगटन ने सभ्यताओं के संघर्ष की भविष्यवाणी की थी। उनकी दृष्टि में सोवियत संघ के विघटन के साथ अमेरिका शीतयुद्ध की चिंता से मुक्त हो गया था और उसे विश्वराजनीति में अपने लिए एक भूमिका की तलाश करनी थी। हंटिंगटन की विश्लेषण बुद्धि ने इस्लामी सभ्यता और उदयोन्मुख चीन को पश्चिम यानी ईसाइयत के भावी शत्रुओं के रूप में रेखांकित किया। किंतु वे सभ्यताकी कोई वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत नहीं कर पाये। अपनी पुस्तक में उन्होंने विश्व के मानचित्र पर सभ्यताओं के विवरण का जो मानचित्र प्रस्तुत किया उसमें उन्होंने उत्तरी अमेरिका कनाडा, पश्चिमी यूरोप, अफ्रीका का दक्षिणी भाग व आस्ट्रेलिया को पश्चिमी सभ्यता का अंग माना जबकि ईसाई मतावलम्बी मैक्सिको सहित दक्षिण अमेरिका को लैटिन अमेरिकी सभ्यता के अंतर्गत रखा, पूर्वी यूरोप व रूस के एशियाई साम्राज्य को आर्थोडॉक्स सभ्यता का नाम दिया जबकि ये तीनों ही क्षेत्र ईसाई पंथ की किसी न किसी शाखा को मानते हैं। उन्होंने चीन, जापान और द.पूर्वी एशिया के बौद्ध देशों को भी अलग-अलग सभ्यता क्षेत्र घोषित किया। उनके इस वर्गीकरण से सवाल खड़ा होता है कि सभ्यता का आधार क्या है? भूगोल, उपासना पंथ या नस्ल? एक ओर वे पश्चिमी सभ्यता को सार्वदेशीय या वैश्विक मानते हैं, दूसरी ओर विश्व की अन्य सभ्यताओं से उसका संघर्ष अनिवार्य देखते हैं। ं
तीन वैश्विक गठबंधन
जहां तक सभ्यताओं के वैश्विक संघर्ष का संबंध है, हंटिंगटन से अस्सी वर्ष पूर्व बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक डेढ़ दशक में एक भारतीय मनीषी ने यह भविष्यवाणी कर दी थी कि बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अन्तरराष्ट्रीय रंगमंच पर तीन वैश्विक गठबंधन आकार लेंगे। इनमें पहला होगा विश्व इस्लामवाद, दूसरा होगा-चीन के नेतृत्व में विश्व मंगोलवाद और इन दो गठबंधनों की प्रतिक्रिया स्वरूप एक या दो युद्धों के पश्चात विश्व यूरोपवाद आकार लेगा। यह विश्व यूरोपवाद हंटिंगटन के विश्व का ही दूसरा नाम है। इस भारतीय मनीषी ने तभी चेतावनी दी थी कि स्वाधीन भारत को खतरा यूरोप से नहीं विश्व इस्लामवाद और विश्व मंगोलवाद से पैदा होगा और इस दोहरे खतरे के विरुद्ध अपने राष्ट्रीय अस्तित्व की रक्षा हेतु उसे यूरोपीय गठबंधन अर्थात् पश्चिमी जगत का सहयोग लेना अपरिहार्य होगा। उन्होंने कहा कि सौर जगत में चीन एकमात्र देश है जिसने यदि कभी भारतीय भूमि पर अपना कब्जा जमा लिया तो उसे वहां से हटाना बहुत कठिन होगा।
चेतावनी की अनसुनी
इसलिए इस मनीषी ने चेतावनी दी थी कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष करते समय भी भारत को स्वाधीन भारत की सीमाओं की सुरक्षा हेतु अपनी जल-थल सैनिक शक्ति को बढ़ाने की चिंता भी अभी से करनी चाहिए। हमने उनकी इस चेतावनी को तो अनसुना किया है, हमारी कमजोर राष्ट्रीय स्मृति ने इस मनीषी को भी पूर्णतया भुला दिया। बंग-भंग विरोधी स्वदेशी आंदोलन में से उभरी लाल- बाल-पाल त्रिमूर्ति में पाल कौन हैं, यह पढ़े-लिखे लोग भी नहीं जानते। इन विपिन चन्द्रपाल ने ही जेल से बाहर निकल कर दो वर्ष इंग्लैंड में रहकर अन्तरराष्ट्रीय जगत के अन्तप्र्रवाहों का सूक्ष्म अध्ययन किया। 1911 में स्वदेश लौटकर उन्होंने कलकत्ता से हिन्दू रिव्यू नामक एक मासिक पत्र आरंभ किया। उस पत्र में 1912 से 1914 तक उन्होंने जो गंभीर लेख लिखे उनका एक संकलन 1916 में नेशनलिटी एंड एम्पायर शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इन लेखों में भारतीय समस्याओं का उनका सम्पूर्ण विवेचन इन तीन वैश्विक गठबंधनों के उदय और संघर्ष पर ही केंद्रित है। मई 1913 में प्रकाशित पैन-इस्लामिज्म (विश्व इस्लामवाद ) पर उनका लेख आंखें खोलने वाला है। इस समय विश्व में सत्ता समीकरण और टकराव का जो परिदृश्य घट रहा है, वह उनकी भविष्य दृष्टि का प्रमाण है।
भारत पहले से ही समभावी
यहां प्रश्न यह है कि क्या विभिन्न उपासना पंथों के बीच संवाद की प्रक्रिया मात्र से ही पारस्परिक सौहार्द और विश्व शांति की स्थापना हो सकेगी? भारत तो इस दृष्टि से आरंभ से प्रयत्नशील रहा है। भगवद्गीता में कृष्ण स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि जो जिस रूप में श्रद्धापूर्वक मेरी अर्चना करना चाहता है, उसकी श्रद्धा को मैं उसी रूप में दृढ़ कर देता हूं। वे यह भी कहते हैं चाहे जिस मार्ग से मेरी उपासना करो वे सब मार्ग मुझ तक ही पहुंचते हैं। इसीलिये भारत ने उपासना पद्धति की विविधता के कभी अस्वीकार नहीं किया, उसका आदर किया। मन की शुद्धता और एकाग्रता को महत्व दिया। इसीलिये हमारे देश में कहावत प्रचलित हुई मन चंगा तो कठौती में गंगा।
बहुश्रुत होना होगा
कौटिल्य के अर्थशास्त्र और अशोक के शिलालेखों में विभिन्न उपासना पंथों के लिए पाषण्डशब्द का प्रयोग किया गया है। प्रत्येक उपासना पंथ अपनी पहचान के लिए कुछ बाह्य चिह्नों को अपनाता होगा। इसलिए पाषण्डशब्द का विकृत रूप पाखण्डबन गया। अशोक अपने एक शिलालेख में कहता है, मैं चाहता हूं कि सभी पाषण्ड मेरे साम्राज्य में सब जगह रहें (सबे पासंडे सर्वत बसेयु) क्योंकि सभी का सारएक ही है बाहरी चिह्नों के बजाय उस सारको ही बढ़ाना चाहिए (सारबद्धि)। वह कहता है कि केवल अपने पासण्डे की प्रशंसा और दूसरों की निंदा उचित नहीं है बल्कि एक दूसरे को सुनना-समझना चाहिए (सबे बहुश्रुत (बहुस्युत) होना चाहिए। वाणी का संयम अपनाना चाहिए (वचि गुवि)। यह कहने से ही आपस में सद्भाव पैदा हो सकता है, वही अच्छा है (समवाय एवं साधु)।
पश्चिमी मॉडल
मनुष्य की आध्यात्मिक साधना अपनी अभिव्यक्ति एवं संवर्धन के लिए साधना का जो पथ अपनाती है, वही उपासना पंथबन जाता है। इसके साथ ही मनुष्य की भौतिक प्रवृत्ति देश और काल की दूरियों पर विजय पाने, शरीर सुख और मनोरंजन के लिए जिन अनेकानेक उपकरणों और साधनों का आविष्कार करती है, वही सभ्यता का ताना-बाना बुनते हैं। जहां तक सभ्यता का प्रश्न है, आज पूरा विश्व सभ्यता के उस मॉडलको अपनाने के लिए व्याकुल और जल्दी में है, जिसका वर्तमान रूप पश्चिमने गढ़ा है। यहां तक अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमजिस चीन को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानता है, वह चीन भी पश्चिमी सभ्यता को अपनाने के लिए दौड़ रहा है। सभ्यता के क्षेत्र में पश्चिम और चीन प्रतिद्वन्द्वी नहीं हैं किंतु ऐतिहासिक परम्पराओं, आस्थाओं और उपासना पद्धति की दृष्टि से अलग-अलग रास्तों पर चल रहे हैं। रोमन कैथोलिक पोप को शिकायत है कि चीन की सरकार ने वहां हमारे र्चच पर सरकारी नियंतण्रस्थापित कर लिया है जबकि चीन की शिकायत है कि आध्यात्मिक दृष्टि से स्वयं खोखला होने पर भी कैथोलिक र्चच पंथांतरण के लिए छल और पल्रोभन का इस्तेमाल कर रहा है।
र्चच से शिकायत भारत को भी र्चच से यही शिकायत
है, पश्चिम के समृद्ध देशों में आस्था की जमीन को खोकर भी र्चच आत्मालोचन और आत्मशुद्धि करने के बजाय भारतीय समाज के गरीब, अपढ़, भोले- भाले वनवासी वर्ग के पंथातरण पर अपनी पूरी शक्ति लगा रहा है। उसी प्रकार इस्लाम और र्चच के बीच अफ्रीकी देशों में पंथातरण की होड़ लगी है। यह विस्तारकारी प्रवृत्ति ही अनेक देशों के भीतर टकराव की स्थिति पैदा कर रही है और विश्वशांति को खतरे में डाल रही है। जब तक संगठित पंथ पंथातरण की विचारधारा का परित्याग नहीं करते और आत्मशोधन नहीं करते, तब तक पंथों के बीच संवाद का कोई परिणाम नहीं निकलेगा। कितनी विचित्र स्थिति है कि पूरे विश्व में दोनों विस्तारवादी पंथ-इस्लाम व ईसाई आमने-सामने खड़े हैं पर भारत में अल्पसंख्यकवादके आवरण में बहुसंख्यक हिन्दू समाज के विरुद्ध एक जुट हो गए हैं। इस स्थिति से बाहर निकलने का एक ही मार्ग है कि संयुक्त राष्ट्र पंथातरण के संगठित प्रयासों को व्यक्ति स्वातंत्र्य पर आघात व अपराध घोषित करें।