यह विस्तारकारी प्रवृत्ति ही अनेक देशों के भीतर टकराव की स्थिति पैदा कर रही है और विश्वशांति को खतरे में डाल रही है। जब तक संगठित पंथ पंथातरण की विचारधारा का परित्याग नहीं करते और आत्मशो धन नहीं करते, तब तक पंथों के बीच संवाद का कोई परिणाम नहीं निकलेगा। कितनी विचित्र स्थिति है कि पूरे विश्व में दोनों विस्तारवादी पंथ-इस्लाम व ईसाई आमने-सामने खड़े हैं पर भारत में ‘अल्पसंख्यकवाद’ के आवरण में बहुसंख्यक हिन्दू समाज के विरुद्ध एक जुट हो गए हैं। इस स्थिति से बाहर निकलने का एक ही मार्ग है कि संयुक्त राष्ट्र पंथांतरण के संगठित प्रयासों को व्यक्ति स्वातंत्र्य पर आघात व अपराध घोषित करें
सयुक्त राष्ट्र संघ का विभिन्न उपासना पंथों के बीच संवाद एवं सौहार्द की प्रक्रिया आरम्भ करने का आह्वान स्वागत योग्य है। किन्तु अब से लगभग बीस वर्ष पूर्व अमेरिकी विचारक सेमुअल हंटिंगटन ने सभ्यताओं के संघर्ष की भविष्यवाणी की थी। उनकी दृष्टि में सोवियत संघ के विघटन के साथ अमेरिका शीतयुद्ध की चिंता से मुक्त हो गया था और उसे विश्वराजनीति में अपने लिए एक भूमिका की तलाश करनी थी। हंटिंगटन की विश्लेषण बुद्धि ने इस्लामी सभ्यता और उदयोन्मुख चीन को पश्चिम यानी ईसाइयत के भावी शत्रुओं के रूप में रेखांकित किया। किंतु वे ‘सभ्यता’ की कोई वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत नहीं कर पाये। अपनी पुस्तक में उन्होंने विश्व के मानचित्र पर सभ्यताओं के विवरण का जो मानचित्र प्रस्तुत किया उसमें उन्होंने उत्तरी अमेरिका कनाडा, पश्चिमी यूरोप, अफ्रीका का दक्षिणी भाग व आस्ट्रेलिया को पश्चिमी सभ्यता का अंग माना जबकि ईसाई मतावलम्बी मैक्सिको सहित दक्षिण अमेरिका को लैटिन अमेरिकी सभ्यता के अंतर्गत रखा, पूर्वी यूरोप व रूस के एशियाई साम्राज्य को आर्थोडॉक्स सभ्यता का नाम दिया जबकि ये तीनों ही क्षेत्र ईसाई पंथ की किसी न किसी शाखा को मानते हैं। उन्होंने चीन, जापान और द.पूर्वी एशिया के बौद्ध देशों को भी अलग-अलग सभ्यता क्षेत्र घोषित किया। उनके इस वर्गीकरण से सवाल खड़ा होता है कि सभ्यता का आधार क्या है? भूगोल, उपासना पंथ या नस्ल? एक ओर वे पश्चिमी सभ्यता को सार्वदेशीय या वैश्विक मानते हैं, दूसरी ओर विश्व की अन्य सभ्यताओं से उसका संघर्ष अनिवार्य देखते हैं। ं
तीन वैश्विक गठबंधन
जहां तक सभ्यताओं के वैश्विक संघर्ष का संबंध है, हंटिंगटन से अस्सी वर्ष पूर्व बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक डेढ़ दशक में एक भारतीय मनीषी ने यह भविष्यवाणी कर दी थी कि बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अन्तरराष्ट्रीय रंगमंच पर तीन वैश्विक गठबंधन आकार लेंगे। इनमें पहला होगा विश्व इस्लामवाद, दूसरा होगा-चीन के नेतृत्व में विश्व मंगोलवाद और इन दो गठबंधनों की प्रतिक्रिया स्वरूप एक या दो युद्धों के पश्चात विश्व यूरोपवाद आकार लेगा। यह विश्व यूरोपवाद हंटिंगटन के विश्व का ही दूसरा नाम है। इस भारतीय मनीषी ने तभी चेतावनी दी थी कि स्वाधीन भारत को खतरा यूरोप से नहीं विश्व इस्लामवाद और विश्व मंगोलवाद से पैदा होगा और इस दोहरे खतरे के विरुद्ध अपने राष्ट्रीय अस्तित्व की रक्षा हेतु उसे यूरोपीय गठबंधन अर्थात् पश्चिमी जगत का सहयोग लेना अपरिहार्य होगा। उन्होंने कहा कि सौर जगत में चीन एकमात्र देश है जिसने यदि कभी भारतीय भूमि पर अपना कब्जा जमा लिया तो उसे वहां से हटाना बहुत कठिन होगा।
चेतावनी की अनसुनी
इसलिए इस मनीषी ने चेतावनी दी थी कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष करते समय भी भारत को स्वाधीन भारत की सीमाओं की सुरक्षा हेतु अपनी जल-थल सैनिक शक्ति को बढ़ाने की चिंता भी अभी से करनी चाहिए। हमने उनकी इस चेतावनी को तो अनसुना किया है, हमारी कमजोर राष्ट्रीय स्मृति ने इस मनीषी को भी पूर्णतया भुला दिया। बंग-भंग विरोधी स्वदेशी आंदोलन में से उभरी लाल- बाल-पाल त्रिमूर्ति में पाल कौन हैं, यह पढ़े-लिखे लोग भी नहीं जानते। इन विपिन चन्द्रपाल ने ही जेल से बाहर निकल कर दो वर्ष इंग्लैंड में रहकर अन्तरराष्ट्रीय जगत के अन्तप्र्रवाहों का सूक्ष्म अध्ययन किया। 1911 में स्वदेश लौटकर उन्होंने कलकत्ता से हिन्दू रिव्यू नामक एक मासिक पत्र आरंभ किया। उस पत्र में 1912 से 1914 तक उन्होंने जो गंभीर लेख लिखे उनका एक संकलन 1916 में नेशनलिटी एंड एम्पायर शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इन लेखों में भारतीय समस्याओं का उनका सम्पूर्ण विवेचन इन तीन वैश्विक गठबंधनों के उदय और संघर्ष पर ही केंद्रित है। मई 1913 में प्रकाशित पैन-इस्लामिज्म (विश्व इस्लामवाद ) पर उनका लेख आंखें खोलने वाला है। इस समय विश्व में सत्ता समीकरण और टकराव का जो परिदृश्य घट रहा है, वह उनकी भविष्य दृष्टि का प्रमाण है।
भारत पहले से ही समभावी
यहां प्रश्न यह है कि क्या विभिन्न उपासना पंथों के बीच संवाद की प्रक्रिया मात्र से ही पारस्परिक सौहार्द और विश्व शांति की स्थापना हो सकेगी? भारत तो इस दृष्टि से आरंभ से प्रयत्नशील रहा है। भगवद्गीता में कृष्ण स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि जो जिस रूप में श्रद्धापूर्वक मेरी अर्चना करना चाहता है, उसकी श्रद्धा को मैं उसी रूप में दृढ़ कर देता हूं। वे यह भी कहते हैं चाहे जिस मार्ग से मेरी उपासना करो वे सब मार्ग मुझ तक ही पहुंचते हैं। इसीलिये भारत ने उपासना पद्धति की विविधता के कभी अस्वीकार नहीं किया, उसका आदर किया। मन की शुद्धता और एकाग्रता को महत्व दिया। इसीलिये हमारे देश में कहावत प्रचलित हुई ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा।’
बहुश्रुत होना होगा
कौटिल्य के अर्थशास्त्र और अशोक के शिलालेखों में विभिन्न उपासना पंथों के लिए ‘पाषण्ड’ शब्द का प्रयोग किया गया है। प्रत्येक उपासना पंथ अपनी पहचान के लिए कुछ बाह्य चिह्नों को अपनाता होगा। इसलिए ‘पाषण्ड’ शब्द का विकृत रूप ‘पाखण्ड’ बन गया। अशोक अपने एक शिलालेख में कहता है, मैं चाहता हूं कि सभी पाषण्ड मेरे साम्राज्य में सब जगह रहें (सबे पासंडे सर्वत बसेयु) क्योंकि सभी का ‘सार’ एक ही है बाहरी चिह्नों के बजाय उस ‘सार’ को ही बढ़ाना चाहिए (सारबद्धि)। वह कहता है कि केवल अपने पासण्डे की प्रशंसा और दूसरों की निंदा उचित नहीं है बल्कि एक दूसरे को सुनना-समझना चाहिए (सबे बहुश्रुत (बहुस्युत) होना चाहिए। वाणी का संयम अपनाना चाहिए (वचि गुवि)। यह कहने से ही आपस में सद्भाव पैदा हो सकता है, वही अच्छा है (समवाय एवं साधु)।
पश्चिमी मॉडल
मनुष्य की आध्यात्मिक साधना अपनी अभिव्यक्ति एवं संवर्धन के लिए साधना का जो पथ अपनाती है, वही ‘उपासना पंथ’ बन जाता है। इसके साथ ही मनुष्य की भौतिक प्रवृत्ति देश और काल की दूरियों पर विजय पाने, शरीर सुख और मनोरंजन के लिए जिन अनेकानेक उपकरणों और साधनों का आविष्कार करती है, वही सभ्यता का ताना-बाना बुनते हैं। जहां तक सभ्यता का प्रश्न है, आज पूरा विश्व सभ्यता के उस ‘मॉडल’ को अपनाने के लिए व्याकुल और जल्दी में है, जिसका वर्तमान रूप ‘पश्चिम’ ने गढ़ा है। यहां तक अमेरिका के नेतृत्व में ‘पश्चिम’ जिस चीन को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानता है, वह चीन भी पश्चिमी सभ्यता को अपनाने के लिए दौड़ रहा है। सभ्यता के क्षेत्र में पश्चिम और चीन प्रतिद्वन्द्वी नहीं हैं किंतु ऐतिहासिक परम्पराओं, आस्थाओं और उपासना पद्धति की दृष्टि से अलग-अलग रास्तों पर चल रहे हैं। रोमन कैथोलिक पोप को शिकायत है कि चीन की सरकार ने वहां हमारे र्चच पर सरकारी नियंतण्रस्थापित कर लिया है जबकि चीन की शिकायत है कि आध्यात्मिक दृष्टि से स्वयं खोखला होने पर भी कैथोलिक र्चच पंथांतरण के लिए छल और पल्रोभन का इस्तेमाल कर रहा है।
र्चच से शिकायत भारत को भी र्चच से यही शिकायत
है, पश्चिम के समृद्ध देशों में आस्था की जमीन को खोकर भी र्चच आत्मालोचन और आत्मशुद्धि करने के बजाय भारतीय समाज के गरीब, अपढ़, भोले- भाले वनवासी वर्ग के पंथातरण पर अपनी पूरी शक्ति लगा रहा है। उसी प्रकार इस्लाम और र्चच के बीच अफ्रीकी देशों में पंथातरण की होड़ लगी है। यह विस्तारकारी प्रवृत्ति ही अनेक देशों के भीतर टकराव की स्थिति पैदा कर रही है और विश्वशांति को खतरे में डाल रही है। जब तक संगठित पंथ पंथातरण की विचारधारा का परित्याग नहीं करते और आत्मशोधन नहीं करते, तब तक पंथों के बीच संवाद का कोई परिणाम नहीं निकलेगा। कितनी विचित्र स्थिति है कि पूरे विश्व में दोनों विस्तारवादी पंथ-इस्लाम व ईसाई आमने-सामने खड़े हैं पर भारत में ‘अल्पसंख्यकवाद’ के आवरण में बहुसंख्यक हिन्दू समाज के विरुद्ध एक जुट हो गए हैं। इस स्थिति से बाहर निकलने का एक ही मार्ग है कि संयुक्त राष्ट्र पंथातरण के संगठित प्रयासों को व्यक्ति स्वातंत्र्य पर आघात व अपराध घोषित करें।