सर्वधर्म समभाव के लिए सर्वाधिक आवश्यक बात यह है कि विभिन्न सांस्थानिक धर्मों की जगह मानव धर्म की बात की जाए। मानव धर्म सांस्थानिक धर्मो से बिल्कुल अलग चीज है बल्कि वह इनके विरोध में है। मनुष्य मात्र होने के नाते किसी को सम्मान और आदर देना ही मानव धर्म के मूल में है। अर्थात् मनुष्य होना ही उसका धर्म है। इसके अतिरिक्त उसका कोई धर्म नहीं है। यह धर्म की ही बात नहीं है। आधुनिक लोकतंत्र के मूल में भी यही बात है। भारतीय साहित्य, दर्शन और ज्ञान परंपरा में मानव धर्म का लम्बा इतिहास है। महाभारत में वेदव्यास ने लिखा है कि मनुष्य के ऊपर कोई नहीं है
हिबयों को लए आये अन्यथा बहिर्गमन ए। कांचीामाणिक न्दुस्तान में सर्वधर्म समभाव के दो रूप दिखाई देते हैं। अच्छे रूप में सर्वधर्म समभाव का अर्थ है-विभिन्न धर्मों के बीच परस्पर सम्मान और आदर की भावना। शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की भावना इसकी बुनियाद है। इसी से जुड़ी यह बात है कि धर्म को व्यक्ति का निजी मामला माना जाए और उसे कोई भी धर्म मानने या न मानने की पूरी आजादी हो। अर्थात् कोई व्यक्ति कौन सा धर्म मानेगा या छोड़ेगा, यह उसकी निजी स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसमें किसी धार्मिक संगठन या राजनीतिक दल की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। यही सर्वधर्म समभाव का सकारात्मक अर्थ है। अगर इसे इस रूप में नहीं लिया जाता तो फिर इसके नाम पर विभिन्न धर्मों के बीच लीपा-पोती का सम्बन्ध बनाया जाता है। यह काम प्राय: नेताओं द्वारा किया जाता है। वे कभी मंदिर तो कभी मस्जिद तो कभी गुरुद्वारे में जाकर अपना दिखावा कर आते हैं। यह धर्म का राजनीतिक दुरुपयोग है। यह सर्वधर्म समभाव का दिखावटी रूप है। इससे सर्वधर्म समभाव का कोई वास्तविक सरोकार नहीं होता। दुर्भाग्य से, हिन्दुस्तान में सर्वधर्म समभाव का यह बुरा वाला दूसरा ही रूप अधिक दिखाई देता है। अब सवाल उठता है कि अगर धर्म व्यक्ति का नितांत निजी मसला है तो क्यों न स्वकर्म को ही स्वधर्म बना दिया जाए? लेकिन इसमें मुझे कई समस्याएं दिखती हैं। एक तो यह कि समाज में मनुष्य कई तरह के होते हैं। अगर कोई चोर है और अपने काम चोरी को ही धर्म मान ले तो स्थिति कैसी होगी? स्व कर्म अगर गलत है तो उसको धर्म मानने में यह बुनियादी कठिनाई है। दूसरी बात यह है कि व्यक्ति अपनी सुविधा और जीवन की जरूरतों को ध्यान में रखकर कर्म को चुनता है। लेकिन धर्म के साथ ऐसी मजबूरी नहीं होती। धर्म तो सच्चे अर्थों में व्यक्ति को उदात्त बनाता है और समाज के उत्थान में सहायक होता है।
सबसे महत्वपूर्ण समस्या यह है कि धर्म के साथ कर्म को जोड़ना एक तरह से वर्ण व्यवस्था का समर्थन करना होगा यानी जिसका जो कर्म निर्धारित है उसे ही वह अपना धर्म माने और उसकी परिधि से बाहर न जाए। गीता में जहां श्रीकृष्ण स्वकर्म को स्वधर्म बताते हैं वहीं वर्णाश्रम का जिक्र है। यह कथन वर्णाश्रम के सन्दर्भ में ही है। कुल मिलाकर बात यह है कि आज के दैनंदिन जीवन की गतिविधियों और वर्णाश्रम के संदर्भ में भी जो बेहतर कर्म है, उसे धर्म मानने में तो कोई दिक्कत नहीं है लेकिन जो खराब कर्म है उसे धर्म के रूप में कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता। सर्वधर्म समभाव के लिए सर्वाधिक आवश्यक बात यह है कि विभिन्न सांस्थानिक धर्मों की जगह मानव धर्म की बात की जाए। दरअसल, ये जितने सांस्थानिक धर्म हैं, इनकी बुनियादी मान्यता यह होती है कि हमारा धर्म ही एकमात्र सच्चा धर्म है, बाकी गलत हैं। इस मान्यता के फलस्वरूप वह यह भी चाहेगा कि बाकी सभी लोग उसी के सच्चे धर्म को माने। इससे एक विद्वेष का वातावरण तैयार हो जाता है। सालों से जो ‘बाबरी मस्जिद’ विवाद चल रहा है उसके मूल में यह श्रेष्ठता वाली ही बात है। उस जगह को ईश्वर का स्थान मान लेने या मंदिर मस्जिद दोनों बना देने में क्या दिक्कत है? लेकिन मस्जिद वाले मंदिर नहीं चाहते और मंदिर वाले मस्जिद नहीं चाहते। यह सब सांस्थानिक धर्मों की समस्याएं हैं। मानव धर्म सांस्थनिक धर्मो से बिल्कुल अलग चीज है बल्कि वह इनके विरोध में है। मनुष्य मात्र होने के नाते किसी को सम्मान और आदर देना ही मानव धर्म के मूल में है। अर्थात् मनुष्य होना ही उसका धर्म है। इसे अतिरिक्त उसका कोई धर्म नहीं है। यह धर्म की ही बात नहीं है। आधुनिक लोकतंत्र के मूल में भी यही बात है। भारतीय साहित्य, दर्शन और ज्ञान परंपरा में मानव धर्म का लम्बा इतिहास है। महाभारत में वेदव्यास ने लिखा कि मनुष्य के ऊपर कोई नहीं है। बंगाल के प्रसिद्ध भक्त कवि चण्डी दास ने इसी बात को दोहराया। इन आधारों पर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘मानव धर्म’ पर एक पूरी किताब ही लिख डाली। महात्मा गांधी भी ठीक इसी अर्थ में धार्मिक थे। दरअसल, जो धार्मिक प्रवृत्ति के लोग हैं, वे अगर ईमानदारी से धार्मिकता का पालन करें,जैसे गांधी करते थे तो कोई समस्या ही नहीं है।
वस्तुत: धर्म के साथ तो ईमानदारी का ख्याल बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। धर्म का अच्छा या बुरा होना उसके ईमानदारी से पालन करने या न करने पर ही निर्भर होता है। अगर गांधी की ही तरह ईमानदारी से पालन किया जाए तो धर्म व्यक्ति के जीवन में प्रेम, करुणा, परोपकार, सेवा आदि रूपों में दिखाई देता है। धर्म इसी रूप में एक जीवन शैली है और उसके इसी रूप के आधार पर एक जीवन दर्शन खड़ा किया जा सकता है। सच्चे धार्मिक व्यक्तियों का जीवन ही धार्मिक संदेश की तरह होता है। विवेकानन्द, अरविन्द, गांधी इसी तरह के महान व्यक्ति थे। इनके यहां धर्म एक जीवनशैली ही है। इसे मैं सरदार पूर्ण सिंह की भांति ‘आचरण की सभ्यता’ कहना ही पसंद करूंगा। लेकिन आज दुर्भाग्य यह है कि धर्म का उपयरुक्त रूप कहीं नहीं दिखता। धर्म के नाम पर पाखंड, छलावा, और तमाम तरह के कुकर्म हैं। ईमानदारी का दूर-दूर तक कहीं नामोनिशान नहीं है। धार्मिक लोग कैसे हैं, यह अब कोई छुपी हुई बात नहीं रह गई है। इनके बारे में आर्थिक से लेकर सैक्स स्कैंडल तक की खबरें मीडिया में खूब आ रहीं हैं। मुझे महाकवि तुलसी दास की एक चौपाई याद आ रही है जो मौजूदा हालात पर बिल्कुल सटीक बैठती है-बंचक भगत कहाई राम के/किंकर कंचन कोह काम के/मतलब कि राम के ये जो धोखेबाज भक्त हैं; वे असल में धन, क्रोध, काम के गुलाम हैं। ऐसे लोगों से धर्म या सर्वधर्म समभाव की दिशा में न तो कभी अतीत में मदद मिली है और न वर्तमान में मिल रही है और न भविष्य में मिलेगी।
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