उत्तरकाशी देवभूमि में धार्मिक व पौराणिक महत्व के कई अवशेष बिखरे पड़े हैं। इनमें से कई अवशेष उत्तराखंड के इतिहास की और परतें खोल सकते हैं। संरक्षण न होने से ऐसे मंदिर समय के साथ अपना अस्तित्व खो रहे हैं। उत्तरकाशी जिले में रैथल व भटवाड़ी के बीच सूर्य मंदिर समूह ऐसा ही अवशेष है, जो अब नष्ट होने की कगार पर है। इस का उल्लेख अंग्रेज खोजकर्ता जेम्स विलियम फ्रेजर के यात्रा वृतांत में भी मिलता है। उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से करीब 42 किमी दूर भटवाड़ी व रैथल गांव के बीच खेतों में पौराणिक सूर्य मंदिर समूह के दो मंदिर हैं। इनको लेकर स्थानीय लोगों में इतनी ही जानकारी है कि कभी इसके आसपास और भी मंदिरों के अवशेष हुआ करते थे। उनमें मूर्तियां व विभिन्न प्रकार के नक्काशीदार पत्थर थे, लेकिन समय के साथ वह चोरी हो गई और अन्य मंदिरों के अवशेष भी नष्ट होते चले गए। जबकि ऐतिहासिक साक्ष्यों के मुताबिक यह मंदिर नौवीं सदी का बना हुआ है। रैथल के निकट सूर्य मंदिर समूह का उल्लेख 1816 में गंगा के उद्गम की खोज में निकले अंग्रेज खोजकर्ता जेम्स विलियम फ्रेजर के यात्रा वृतांत में मिलता है। हालांकि, गंगोत्री तक की उनकी यात्रा पूरी नहीं हो सकी थी, लेकिन अपने यात्रा रूट में पड़ने वाले मंदिर समूहों व धार्मिक स्थलों का वर्णन उन्होंने विस्तार से किया है। पांच वर्ष पूर्व पुरातत्व विभाग ने पौराणिक मंदिरों के निकट एक कंक्रीट का मंदिर तैयार करने के साथ ही एक बोर्ड टांग कर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर दी। उसके बाद विभाग ने इन मंदिरों की देखरेख को लेकर कोई कदम नहीं उठाया। इतिहास के जानकार उमारमण सेमवाल बताते हैं कि नवीं सदी की इस धरोहर का उल्लेख इतिहास की पुस्तकों में मिलता है। गंगोत्री धाम यात्रा मार्ग में ऐसे मंदिरों की बहुलता रही है, जो 1803 में आए भूकंप में नष्ट हुए थे। इसके बाद संरक्षण न मिलने से नष्ट होते जा रहे हैं। उत्तरकाशी के विश्वनाथ मंदिर के महंत अजय पुरी ने बताया कि पहले यह मंदिर समूह टिहरी व उत्तरकाशी के अन्य मंदिरों की तरह रियासत काल में बने टैंपल बोर्ड के ही संरक्षण में था। पांच वर्ष पहले ही इसकी जर्जर स्थिति को देखते हुए पुरातत्व विभाग ने इसे अपने अधीन कर लिया।
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