Thursday, February 3, 2011

क्या धर्म एक तलवार है?


दुनिया के सारे धर्म अपने-अपने समाजों को सुरक्षित व संवर्धित करने की व्यवस्था करने के लिए मान्य किये गये हैं, दूसरी व्यवस्था को तोड़ने के लिए नहीं। इसलिए धर्मनिरपेक्षता जैसी स्थिति मानव समाज में हो ही नहीं सकती है। होना तो धर्म सापेक्ष है यानी धर्म की कसौटी पर ही हम अपने हर निजी व सार्वजनिक सवालों को कसेंगे और उनका हल खोजेंगे। मुझे लगता है जो जीवन और जीव का संरक्षण व संवर्धन कर सके वही आज के युग का धर्म है
तीस जनवरी फिर सामने आ खड़ी हुई है और फिर हमारे सामने हैं तीन गोलियों से बिंधे महात्मा गांधी! हमने इसी तारीख को, आज से कोई 63 साल पहले यही सोच कर 80 साल के इस बूढ़े आदमी को गोली मारी थी कि यह ऐसे नहीं जाता है तो ऐसे जायेगा। सारी हिन्दुत्ववादी शक्तियों की शह पा कर हत्या कर दी नाथूराम गोडसे ने लेकिन न उसे पता था और न इन्हें कि ऐसे लोग ऐसे नहीं जाते हैं। ईसा मसीह तो कहते हैं, सूली पर चढ़ाये जाने के बाद फिर वापस आये थे देखने कि जिन्होंने उन्हें सजा दी थी उन्हें तकलीफ तो नहीं हुई और उस दिन से ईसा मसीह प्रभु यीशू बनकर जो जीवित हुए तो आज तक दिल से दिलों तक चले ही जा रहे हैं। गांधी भी उस दिन मरे मान लिये गये जिस दिन तीन गोलियों से उनका काम तमाम कर भाई लोगों ने गंगा नहा लिया था, लेकिन उस दिन से गांधी रोज-रोज चलते-बढ़ते ही जाते हैं। कहा तो उन्होंने था कि वे कब्र से भी आवाज लगाते रहेंगे लेकिन हम देखते हैं कि वे तो हर गांव-नगर-मोड़, गली-चौराहे पर खड़े होकर आवाज लगा रहे हैं। आप देखिए न, भारत ने नहीं संयुक्त राष्ट्रसंघ ने घोषित किया कि वह गांधी के जन्मदिन को सारी दुनिया में अहिंसा दिवस के तौर पर आयोजित करेगा, तब से हर साल सारी दुनिया की युद्धरत सरकारें भी इस दिन जैसे हथियार डाल देती हैं। मानो कुरुक्षेत्र के मैदान में छिड़े महाभारत में शाम उतर आई हो। शाम होती तो बहुत छोटी सी है लेकिन उसका होना कितना बड़ा मतलब रखता है यह जानना हो तो महाभारत के सिपाहियों से आप पूछ लें। इसलिए 364 दिनों की तुलना में चाहे जितना छोटा हो, यह एक दिन का अहिंसा दिवस। जिनकी गर्दन एक दिन के लिए कटने से बच जाती है, उनकी जगह खुद को रखकर बताइए कि गांधी का इस तरह होना भी कुछ अर्थ रखता है या नहीं।
सर्वधर्म समभाव के पीछे भी गांधी
अभी अगले महीने ही सारी दुनिया में सर्वधर्म समभाव दिवस मनाया जायेगा, इसके पीछे भी वही गांधी है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की यह कोशिश है यानी उसके सदस्य देशों की गहरी इच्छा में से यह भी फलीभूत हुआ है। गांधी की अत्यंत गहन व गहरी आस्था सर्वधर्म समभाव में थी और वे इसे इंसान के मन में उतारने की साधना करते रहे थे। यह साधना ही इतनी प्रबल थी कि उससे घबरा कर हिंदुत्ववादियों ने इसकी जड़ काट दी। इसलिए कि 1934 में गांधी जी ने कहा था- मैं इस बात की तरफ से बिल्कुल ही उदासीन हूं कि हिंदू धर्म सबल हो रहा है या निर्बल अथवा नष्ट हो रहा है। इस संबंध में मेरी अपनी जो स्थिति है, उसके सही होने में मेरा इतना अधिक विश्वास है कि अगर मेरी उस स्थिति से हिंदू धर्म कमजोर हो रहा है तो भले हो, मुझे उसकी कोई परवाह नहीं।
बापू के सपनों का हिन्दुस्तान
धर्मसंबंधी अपनी मान्यताओं को बार-बार स्पष्ट करते हुए वे एक ऐसा हिंदुस्तान बनाने की कल्पना करते हैं जिसमें प्रत्येक इंसान अपने निजी विश्वासों के आधार पर जी सके और सारा मुल्क सामूहिक विश्वास के आधार पर एक रह सके। इसलिए मुहम्मद अली जिन्ना के साथ विभाजन से पहले की अपनी आखिरी समझौता वार्ता के दौरान हम उन्हें जिन्ना के समक्ष दिल और दिमाग का अत्यंत उत्कृष्ट समर्पण करते पाते हैं। लेकिन बातचीत में एक बिंदु ऐसा आता है, जहां पहुंच कर वे वज्र की तरह कठोर हो जाते हैं। जिन्ना कहते हैं,‘मिस्टर गांधी, आपके साथ बातचीत करने में मुझे बड़ी उलझन होती है। आप खड़े कहां हैं, यही तो पता नहीं चलता है। मैं मुस्लिम लीग का एकमात्र नेता हूं और मुसलमानों का अंतिम प्रवक्ता। इस भूमिका में मेरे साथ बातचीत आसान हो जाती है। लेकिन आप? आप कांग्रेस के एकमात्र नेता नहीं हैं, हिंदुओं के अंतिम प्रवक्ता भी नहीं है। आप देश के सभी लोगों की तरफ से बोलते हैं। मुसलमानों की तरफ से भी मुझे यह भूमिका कबूल नहीं है। मैं मुसलमानों का नेता हूं और आप हिन्दुओं के नेता हैं, इस भूमिका में हमारी बात होगी तो परिणाम जल्दी आयेगा।
बस, यही वह आखिरी बात थी, जहां से वार्ता टूटी। गांधी ने कहा-मैं हिन्दुस्तानी से छोटी किसी पहचान को स्वीकार करता ही नहीं हूं और इसलिए हिंदुओं का एकमात्र प्रवक्ता बनकर, मुसलमानों के एकमात्र प्रवक्ता के साथ बात करूं, यह मुझे कभी भी कबूल नहीं है।इतिहास में दर्ज है कि जो महात्मा गांधी कभी भी, किसी भी पहर नंगे पांव चलकर भाई जिन्नासे बात करने को तैयार रहते थे। इसके बाद से गोली खाने तक कभी जिन्ना से मिलने या उनसे बात करने नहीं गये।
धर्म मनुष्य को जोड़ता है
आस्था की कसौटी पर सर्वधर्म समभाव बहुत धारदार विचार बन जाता है क्योंकि तब वह मेरा धर्म तेरा धर्म की भाषा भूलकर, सारे धर्मो के साथ और उससे भी गहरी बात कि सारे इंसानों के साथ अपनी डोर जोड़ लेता है। गांधी लिखते हैं, ‘धर्म मनुष्य को मनुष्य से अलग करने के लिए नहीं, उनको आपस में जोड़ने के लिए हैं। सभी धर्मग्रंथों में बहुत सी ऐसी बातें हैं जो मुझे चक्कर में डालती हैं। मैं आशा करता हूं कि किसी दिन मुझे उनके विषय में प्रकाश मिलेगा। मैं इस्लाम को निश्चय ही एक ईश्वर प्रणीत धर्म मानता हूं और इसलिए कुरान शरीफ को भी ईश्वर प्रणीत मानता हूं तथा मुहम्मद साहब को एक पैगंबर मानता हूं मैं हिंदू धर्म, ईसाई धर्म, पारसी धर्म आदि आदि के बारे में भी ऐसा ही मानता हूं। पैगंबर अनेक हो गये हैं। उन्होंने अनेक धर्मो का प्रवर्तन किया है। उनमें से बहुतों के नामोनिशान भी आज बाकी नहीं हैं क्योंकि वे विविध धर्म और वे अनेक पैगंबर अपने-अपने समय के लिए, उस समय के लोगों के लिए थे। विभिन्न धर्मो का यथासंभव अध्ययन करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि यदि सभी धर्मो के प्रति समभाव करना उचित और आवश्यक है तो उन सबकी गुरुकिल्ली होनी चाहिए और यह कुंजी सत्य और अहिंसा है। इस कुंजी से जब मैं किसी धर्म की पेटी खोलता हूं तो मुझे दूसरे धर्मो से उस धर्म का ऐक्य साधने में जरा भी परेशानी नहीं होती है। यद्यपि सभी धर्म पत्तों के रूप में अलग-अलग दिखाई देते हैं लेकिन जब हम तने की ओर देखते हैं तब सब एक ही दिखाई देते हैं। इतना अगर हम समझ सकें तभी और केवल तभी धर्म के नाम पर जो लड़ाइयां होती आई हैं, वे बंद हो जायेंगी। ऐसी लड़ाइयां केवल हिंदू और मुसलमानों के बीच ही नहीं होती हैं, सभी धर्मो में ऐसी लड़ाइयां हुई हैं जिनके वर्णन से इतिहास के पन्ने रंगे हुए हैं। धर्म की रक्षा उस धर्म के अनुयायियों की पवित्रता और उनके सत्कर्मो से होती है। विधर्मियों के साथ झगड़ा करने से नहीं।
धर्मनिरपेक्षता नहीं धर्मसापेक्षता
धर्म का अर्थ क्या है? जो किसी को धारण करता है यानी कबूल करता है। सुरक्षित व संवर्धित करता है, वह धर्म है। दुनिया के सारे धर्म अपने-अपने समाजों को सुरक्षित व संवर्धित करने की व्यवस्था करने के लिए मान्य किये गये हैं, दूसरी व्यवस्था को तोड़ने के लिए नहीं। इसलिए धर्मनिरपेक्षता जैसी स्थिति मानव समाज में हो ही नहीं सकती है। होना तो धर्म सापेक्ष है यानी धर्म की कसौटी पर ही हम अपने हर निजी व सार्वजनिक सवालों को कसेंगे और उनका हल खोजेंगे। धर्म क्या है, बस इसकी समझ साफ करने की जरूरत है। आज जैसी दुनिया में और जिस तरह मानव जाति रह रही है उसमें उसकी सुरक्षा व संवर्धन करने वाले धर्म की कसौटी क्या होगी? हिंदुस्तान में या पाकिस्तान में या चीन जापान में नहीं, सारी दुनिया में और सारी दुनिया के लिये? मुझे लगता है जो जीवन और जीव का संरक्षण व संवर्धन कर सके वही आज के युग का धर्म है। यह हमारे सभी प्रचलित धर्मग्रंथों से आगे की परिकल्पना है क्योंकि हमारा सबसे नया धर्मग्रंथ भी सैकड़ों साल पुराना हो गया है। इसलिए यह नये धर्म के उदय का काल है जो किसी जाति, मुल्क या किताब में से निकल कर सामने नहीं आयेगा। ईमान की रोटी और इज्जत की जिंदगी प्राणिमात्र के लिए उपलब्ध हो, ऐसे धर्म की आज जरूरत है। पक्की आस्था से ही इस धर्म का सर्जन संभव है। तो गांधी कहते हैं, ‘आस्था कोई सुकोमल कली नहीं है, जो हल्के से तूफानी मौसम में डगमगा जाये। वह तो हिमालय पहाड़ के समान है जो कभी डिग नहीं सकता।ऐसी अडिग आस्था के साथ, सारी दुनिया के लोग, दुनिया के सारे सभी धर्मो को विवेक की एक-सी कसौटी पर कसने की हिकमत सीख सकें तो हमें सर्वधर्म समभाव की वह कुंजी हाथ लगेगी जिसकी तलाश में गांधी तीन गोलियों से बिंधे थे। जब तक ऐसा नहीं होता है, हममें धर्म की समझ पैदा नहीं होगी और जब तक वह समझ नहीं पैदा होती है कितने ही गांधियों को कितनी ही बार गोलियों का सामना करना होगा। धर्म तलवार नहीं है, हमें मनुष्य बनाने वाली ढाल है- वह ढाल जो सर्वधर्म समभाव के कारखाने में ही तैयार हो सकती है।

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