देवी भक्तों की सिर्फ सच्चे मन की श्रद्धा से ही प्रसन्न हो जाती हैं। यहां देवी मां पर जटा नारियल, लाल वस्त्र, सिंदूर, धूप, दीप आदि चढ़ावा चढ़ता है। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु घंटी या छतरी चढ़ाते हैं। नव विवाहित स्त्रियां यहां आकर अटल सुहाग की कामना करती है
रामनगर, उत्तराखंड से 10 किमी दूरी पर गर्जिया नाम की जगह है, जहां भगवान शिव की अर्धागिनी गिरिजा देवी का मंदिर है। गिरिराज हिमालय की पुत्री होने के कारण उन्हें इसी नाम से बुलाया जाता है। उत्तराखंड स्थित इस मंदिर का सही तरीके से निर्माण 1970 में किया गया। कहते हैं, गर्जिया नामक यह तीर्थ स्थल 1940 से पहले उपेक्षित अवस्था में था। वहां के निवासियों के अनुसार, 1940 साल से पहले यह क्षेत्र घने जंगलों से भरा पड़ा था। सबसे पहले वहां के निवासी वहां के टीले पर इन मूर्तियों को देखा और इस स्थान पर उन्हें माता रानी की उपस्थिति का अहसास हुआ। वहां के लोगों की धारणा है कि वर्तमान में गर्जिया मंदिर जिस टीले पर स्थित है, वह कोसी नदी की बाढ़ में कहीं ऊपरी क्षेत्र से बहकर आ रहा था। मूर्तियों को टीले के साथ बहते हुए आता देख भैरव ने उसे रोकने का प्रयास किया और कहा, ‘ठहरो बहना ठहरो, यहां पर मेरे साथ निवास करो‘। तभी से गर्जिया में देवी उपटा में निवास कर रही है। बहुत पहले गिरिजा देवी को उपटा देवी के नाम से भी जाना जाता था। इस मंदिर में मां गिरिजा देवी अपनी बहुत सारी महिमाओं के लिए प्रसिद्ध है। कहते हैं कि यहां देवी भक्तों की सिर्फ सच्चे मन की श्रद्धा से ही प्रसन्न हो जाती हैं। यहां देवी मां पर जटा नारियल, लाल वस्त्र, सिंदूर, धूप, दीप आदि चढ़ावा चढ़ता है। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु घंटी या छतरी चढ़ाते हैं। नव विवाहित स्त्रियां यहां आकर अटल सुहाग की कामना करती हैं। नि:संतान दं पत्ति संतान प्राप्ति के लिए माता रानी के समक्ष झोली फैलाते हैं। गर्जिया मंदिर के साथ-साथ यहां सरस्वती, गणोशजी तथा बटुक भैरव की संगमरमर की मूर्तियां भी शामिल हैं। सभी मंदिर में स्थापित मूर्ति यहीं पर खुदाई के दौरान मिली थी। यहां के पूजा के नियम के अनुसार माता गिरिजा की पूजा करने के बाद बाबा भैरव को भी चावल और उड़द की दाल चढ़ाकर पूजा-अर्चना करना आवश्यक माना जाता है। कहा जाता है कि भैरव की पूजा के बाद ही मां गिरिजा देवी की पूजा का संपूर्ण फल प्राप्त होता है। वैसे तो पूरे साल माता गिरिजा देवी की पूजा के लिए श्रद्धालुओं के भीड़ लगी रहती है मगर वसंत पंचमी में काफी संख्या में दर्शनार्थी यहां आते हैं। कार्तिक पूर्णिमा को गंगा स्नान के पावन पर्व के मौके पर माता गिरिजा देवी के दर्शन एवं पतित पावनी कोसी नदी में स्नान करने के लिए भारी संख्या में यहां भीड़ उमड़ती है। इसके साथ ही गंगा दशहरा, नवरात्र, शिवरात्रि, उत्तरायणी में भी बहुत भीड़ होती है और मेला भी लगता है।
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