सीर हो गया रविदास का बे-गम पुरा
बेगमपुरा...संत रविदास से जुड़ी किसी जगह का नाम नहीं, बल्कि उनकी परिकल्पना है। एक ऐसे शहर की परिकल्पना जिसमें गम के लिए कोई स्थान नहीं। वहां रहने वाले सिर्फ परमात्मा का स्मरण करने में तल्लीन हों। संतश्री की इस परिकल्पना को यथार्थ रूप प्रदान करने के लिए भले ही सामाजिक जंग जारी है, लेकिन उनकी जन्म स्थली सीर गोवर्धन पुर में कुछ समय के लिए बे-गम पुरा साकार हो गया है। जालंधर समेत पंजाब के तमाम स्थानों से पहुंच रहे श्रद्धालु काशी के इस दक्षिणी छोर को बेगमपुरा कहने लगे हैं। मान्यता है कि संत रविदास का जन्म यहीं हुआ था।
संत रविदास जयंती उत्सव के निमित्त शहर के सीरगोवर्धन क्षेत्र में जुटे लाखों भक्त अपने तमाम गम भुलाकर सिर्फ परमात्मा का स्मरण कर रहे हैं। जो जिस काम में लगा है, उसी के जरिए प्रभु स्मरण में मगन है। एक दर्जन से अधिक सांझा चूल्हों पर रोटी बनाती महिलाओं का समूह हो, चाहे सब्जी के लिए आलू और मटर छीलती महिलाओं का समूह। रोटियां बनाने और सब्जियां काटने-छीलने के दौरान संत रविदास के भजन उनके अधरों पर नर्तन कर रहे हैं। सुरक्षा से लेकर सेवा तक के विभिन्न कार्यों में लगे स्वयंसेवकों की आंखों की चमक यह सोचकर बढ़ जा रही है कि वे प्रभु के भक्तों की सेवा कर रहे हैं। शानो शौकत और ठाठबाट से रहने वाले लोग घर, कारोबार, नौकरी, बीमारी हर ओर से ध्यान हटा कर संत रैदास के उस दोहे के मर्म को जी रहे हैं जिसमें उन्होंने अपनी परिकल्पना का चित्रण किया है। ‘बेगमपुरा शहर को नाव, दुख अंदोह नहीं तह ठांव’ अर्थात मैं एक ऐसा शहर बसाना चाहता हूं जिसका नाम बेगमपुरा हो। वहां के निवासी बे-गम हों। वहां दुख और अज्ञानता को कोई स्थान न मिले। इस दोहे के मर्म को हकीकत में बदलने के लिए संगीत का सहारा भी लिया जा रहा है। ‘जंग जारी है’ नाम से तैयार म्यूजिक एलबम मंदिर के आसपास की दुकानों पर बिक रहे हैं।
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